काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
एकत्रिंशः स्तबकः - उपजातिवृत्तम्

“नामवैभवम्” — अर्थात् “दिव्य नाम की महिमा” शीर्षक वाला यह इकतीसवाँ स्तबक उमा देवी के पवित्र नामों के जप, कीर्तन और स्मरण से उत्पन्न होने वाली आध्यात्मिक शक्ति का विस्तृत गान करता है। श्री गणपति मुनि बार-बार अपनी जिह्वा और मन को सम्बोधित करते हुए उन्हें देवी को अम्बा, भवानी, भद्रा, दुर्गा आदि पवित्र नामों से पुकारने के लिए प्रेरित करते हैं। वे घोषित करते हैं कि देवी का नामस्मरण पापों को शुद्ध करता है, भीतर निहित शक्ति को जागृत करता है, भय का नाश करता है और साधक को पूर्णता तथा मुक्ति की ओर ले जाता है। इसलिए नामवैभवम् शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। पूरे स्तबक में देवी के नाम में निहित आध्यात्मिक शक्ति, माधुर्य और रक्षण-सामर्थ्य विशेष रूप से प्रकट होते हैं।
मुनि नामसंकीर्तन को अत्यन्त सरल और प्रत्यक्ष साधना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यज्ञ, दान, व्रत और गूढ़ तान्त्रिक साधनाओं की तुलना करते हुए वे साहसपूर्वक बताते हैं कि भक्ति के साथ देवी का नाम जपने से उन विस्तृत साधनाओं द्वारा अपेक्षित फलों को भी प्राप्त किया जा सकता है। देवी का नाम अमृत से भी अधिक मधुर, प्रियतम के अधरों से भी अधिक मनोहर, गङ्गा के समान पवित्र करने वाला और सभी प्राणियों में सुप्त शक्ति को जागृत करने वाला बताया गया है। इसलिए नाम मात्र एक ध्वनि-चिह्न नहीं है; वह देवी की उपस्थिति और अनुग्रह को प्रत्यक्ष रूप से प्रवाहित करने वाला शब्द-तेज का माध्यम है।
इस स्तबक में मुनि की वाक्चातुरी, भक्तिपूर्ण प्रेरणा, अतिशयोक्ति, उपमा-कौशल और चमत्कारपूर्ण दार्शनिक तर्कशैली विशेष रूप से दिखाई देती है। मनुष्य सरल मार्ग को छोड़कर कठिन उपायों के पीछे भागता है — इस प्रवृत्ति पर वे कुछ स्थानों पर विनोदपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। अपनी जिह्वा को सीधे सम्बोधित करके वे उसे देवी-नामस्मरण में स्थिर रहने का आदेश देते हैं।
अनेक पारम्परिक उपमानों को भी देवी के नाम की महिमा के सामने अपर्याप्त सिद्ध कर देना उनकी काव्यशैली की एक विशिष्ट विशेषता है।
उपजाति छन्द इस स्तबक के उपदेश, स्तुति और उल्लासपूर्ण भक्तिप्रवाह को अत्यन्त सहजता से वहन करता है। अन्तिम श्लोक में मुनि कहते हैं कि श्रद्धारहित लोग देवी के नाम की वास्तविक शक्ति को सहजता से नहीं समझ सकते, जबकि सिद्धजन ही उसकी महिमा का यथार्थ गान करते हैं। इस प्रकार यह स्तबक नामस्मरण को एक पूर्ण भक्तिमार्ग तथा आध्यात्मिक जागरण और साक्षात्कार की सरल और समर्थ साधना के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए समाप्त होता है।
एकत्रिंशः स्तबकः - उपजातिवृत्तम्
नामवैभवम्
दरस्मितश्रीकपटा सुपर्वस्रोतस्विनी पर्वतजास्यजाता ।
पङ्कं मम क्षालयतादशेषं संसारमग्ने हृदये विलग्नम् ।। ७५१।।
हराट्टहासेन समं मिलि त्वा पित्रेव पुत्रो गुरुणेव शिष्यः ।
विभ्राजमानो मम शं करोतु हासाङ्कुरः केसरिवाहनायाः ।। ७५२।।
नमश्शिवायै भणत द्विपादो युष्माकमग्र्यां धिषणां दधत्यै ।
आधारचक्रेशितुरम्बिकायै ब्रह्माण्डचक्रस्य विधायिकायै ।। ७५३ ।।
नदन्ति गावोऽपि विशिष्टकालेष्वम्बेति यो नाह्वयते स किं ना ।
लक्ष्यं पुनः प्राणवदस्तु सर्वं सर्वस्य चान्तर्हि पराऽस्ति शक्तिः ।। ७५४।।
आत्मन्युतान्यत्र विधाय लक्ष्यं तां शक्तिमाद्यामखिलेषु सुप्ताम् ।
यावत्प्रबोधं मुहुराह्वयस्व प्रबुध्यते सा यदि किन्वसाध्यम् ।। ७५५।।
ये नाम शान्ति परमां वहन्तो नामानि शीताचलपुत्रिकायाः ।
सङ्कीर्तयन्तो विजने वसन्ति जयन्ततातादपि ते जयन्ति ।। ७५६ ।।
नामानि सङ्कीर्तयतां जनानां कारुण्यवत्याः करिवक्त्रमातुः ।
पुनर्जनन्या जठरे निवासादायासवत्ता भवतीति मिथ्या ।। ७५७।।
पापैस्समन्तात्समभिद्रुतोऽपि विश्वस्य ते विक्रममस्मि धीरः ।
न चेद्रसज्ञे भवती ब्रवीति नामानि शीतांशुभृतो हतोऽहम् ।। ७५८ ।।
देहीति सम्पल्लवदर्पितानां द्वारेषु घोषं कुरुषे परेषाम् ।
भवानि भद्रे भुवनाम्ब दुर्गे पाहीति नायाति किमम्ब जिह्वे ।। ७५९ ।।
वाक्यानि वक्तुं यदि ते रसज्ञे रसोज्ज्वलानि व्यसनं गरीयः ।
किं वा नमोन्तानि सुधां किरन्ति नामानि नो सन्ति कुमारमातुः ।। ७६०।।
यद् गीयते शैलसुताभिधानं तदेव बोध्यं सुकृतं प्रधानम् ।
अज्ञानिलोकस्य कृते भणन्ति यज्ञादिपुण्यानि पराणि विज्ञाः ।। ७६१।।
साम्ना प्रयुक्तेन जगद्वशे स्यात् नाम्ना सदोक्तेन जगद्विनेत्री ।
वेदोभयं सम्यगिदं कृती यो भवे भयं तस्य कुतोऽपि न स्यात् ।। ७६२।।
सङ्कीर्तनात्तुष्यति शर्वयोषा तुष्टा त्वभीष्टं न ददाति नैषा ।
इमं त्वविज्ञाय जगत्युपायं ब्रजन्त्यपायं बहुधा मनुष्याः ।। ७६३।।
भाषे भुजङ्गाभरणप्रियाया नामानि कामानितरान् विहाय ।
अपि प्रपञ्चातिगघोरकृत्यं करोतु किं मां तरणेरपत्यम् ।। ७६४।।
यज्ञेन दानैः कठिनव्रतैर्वा सिद्धिं य इच्छेत्स ग्रहीतुमिच्छेत् ।
मातुः शयानोऽङ्कतले शशाङ्कं महेश्वरीं कीर्तयतस्तु सिद्धिः ।। ७६५।।
रहस्यतन्त्रा णि विविच्य दूरं व्याजं विमुच्य प्रवदामि सारम् ।
नामैव कामारिपुरन्ध्रिकायाः सिद्धेर्निदानं न मखो न दानम् ।। ७६६।।
पीयूषमीषन्मधुरं भणन्ति ये नाम रामाधरपानलोलाः ।
कामारिरामाह्वयगानलोलाः कवीश्वराः काञ्जिकमालपन्ति ।। ७६७।।
सुधाघटः कोऽप्यधरो वधूनां कविस्सुधातोयधरोऽभिधेयः ।
अयं सुधावीचिवितानमाली नामप्रणादो नगकन्यकायाः ।। ७६८ ।।
सुरालये भातितरां सुधैका सुधा परा वाचि महाकवीनाम् ।
बिम्बाधरे कञ्जदृशां सुधाऽन्या सुधेतरा नामनि लोकमातुः ।। ७६९।।
माधुर्यमाभात्यधरे वधूनां चकोरबन्धोः शकले प्रसादः ।
त्रिस्रोतसो वारिणि पावनत्वं त्रयं च नाम्नि त्रिपुराम्बिकायाः ।। ७७० ।।
या माधुरी प्रेमभरेण दष्टे जागर्ति कान्तावरदन्तचेले ।
सा दृश्यते भक्तिभरेण गीते धराधराधीशसुताभिधाने ।। ७७१।।
यत्ते जगल्लम्पटकेऽपि वर्णास्तन्मेऽमृतं नाम नगात्मजायाः ।
लालामयो यो मम तं ब्रवीषि सुधामयं स्त्रीदशनच्छदं त्वम् ।। ७७२।।
उच्चारयोच्चाटितपातकानि नामानि जिह्वे भुवनस्य मातुः ।
तदा वदामो मधुचूतरम्भा-रामाधरास्ते रुचये यदि स्युः ।। ७७३।।
आक्षेपमिक्षोरधिकं विधत्ते पीयूषदोषानभितोऽभिधत्ते ।
कान्ताधरारब्धदुरन्तवादः कपर्दिकान्तावरनामनादः ।। ७७४ ।।
विश्वासहीनैः सुतरामबोध्यं नामानुभावं नगकन्यकायाः ।
जयन्तु सिद्धैरपि गीयमानं गायन्त्य एता उपजातयो नः ।। ७७५।।
