top of page

काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

द्वात्रिंशः स्तबकः - आर्यागीतिवृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“भक्तिर्योगश्च” — अर्थात् “भक्ति और योग” शीर्षक वाला यह बत्तीसवाँ स्तबक आध्यात्मिक साक्षात्कार के दो प्रमुख मार्गों को एक साथ प्रस्तुत करता है और दिखाता है कि उमा देवी की उपासना में वे अन्ततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। श्री गणपति मुनि देवी के कारणरूप और व्यक्तरूप के बीच का भेद स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि योगी दृढ़ एकाग्रता के द्वारा उनके सूक्ष्म कारणस्वरूप का आश्रय लेता है, जबकि भक्त प्रेमपूर्ण शरणागति के साथ उनके व्यक्त दिव्यरूप को अपनाकर संरक्षण प्राप्त करता है। किन्तु वे सावधान करते हैं कि जब तक अहंकार और आसक्ति का क्षय नहीं होता, तब तक दोनों ही मार्ग पूर्णता को प्राप्त नहीं करते। अहंकार से मिश्रित भक्ति अपूर्ण रहती है, और बाह्य विषयों की ओर बिखरता हुआ योग परिपक्व नहीं हो सकता। इसलिए भक्तिर्योगश्च शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। यह स्तबक भक्ति और योग को एक ही दिव्यमाता तक पहुँचने वाले परस्परपूरक मार्गों के रूप में तुलना करते हुए अन्ततः उनका समन्वय करता है।


आगे के श्लोकों में यह समन्वय और अधिक गहराई प्राप्त करके अन्तर्यज्ञ के तत्त्व के रूप में विकसित होता है। चूँकि देवी समस्त जीवों में प्राणशक्ति के रूप में निवास करती हैं, इसलिए जीवों की सेवा भी उनकी आराधना बन जाती है। वहाँ से मुनि यज्ञ की पूरी अवधारणा को अन्तर्मुख कर देते हैं: प्राण ही यज्ञाग्नि है; इन्द्रियाँ और उनके अनुभव ही हवि हैं; दृष्टि को अन्तःरूप में, श्रवण को प्राण में स्थित गूढ़ नाद में, वाणी को आदिस्पन्दन में और अन्ततः मन को सूक्ष्म शक्ति में समर्पित करना चाहिए। चलना, कर्म करना, विसर्जन, भोग — प्रत्येक क्रिया यदि पूर्ण सजगता के साथ जी जाए, तो सम्पूर्ण जीवन ही एक निरन्तर यज्ञ बन जाता है। इस प्रकार भक्ति शरणागति में परिपक्व होती है, योग अन्तर्मुख लय में विकसित होता है, और दोनों अन्ततः व्यक्तित्व को जगन्माता की प्राणशक्ति में समर्पित करने वाली एक ही साधना बन जाते हैं।


यह स्तबक श्री गणपति मुनि के योग, वेदान्त, प्राणविद्या, अन्तर्यज्ञतत्त्व और भक्ति-मनोविज्ञान पर असाधारण अधिकार को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। वे भक्ति और योग को परस्पर विरोधी परम्पराओं के रूप में नहीं देखते; उनकी साधना में उत्पन्न होने वाली कमियों का भी केवल सिद्धान्त की दृष्टि से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष साधनानुभव की दृष्टि से विश्लेषण करते हैं। वे दिखाते हैं कि अहंकार के कारण दोनों कैसे अपूर्ण रह जाते हैं और आत्मसमर्पण के द्वारा दोनों कैसे सिद्धि और पूर्णता प्राप्त करते हैं।


प्रवाहमय आर्यागीति छन्द दार्शनिक विश्लेषण से योगसाधना के प्रत्यक्ष निर्देशों तक सहजता से आगे बढ़ने के लिए अत्यन्त अनुकूल है। अष्टम शतक के समापन स्तबक के रूप में यह एक शक्तिशाली समन्वय प्रस्तुत करता है: सच्ची भक्ति और सच्चा योग अन्ततः दो अलग-अलग मार्ग नहीं हैं; वे प्रत्येक जीव में चेतना, श्वास और अन्तर्यज्ञशक्ति के रूप में निवास करने वाली सर्वव्यापिनी पराशक्ति में व्यक्तिगत अहंभाव को समर्पित करने वाली एक ही अन्तर्मुख गति हैं।


द्वात्रिंशः स्तबकः - आर्यागीतिवृत्तम्

भक्तिर्योगश्च


विदधातु सम्पदं मे सकलजगन्नाथनयनहारिज्योत्स्नः ।

शीतोऽन्धकारहारी हासशशी कश्चिदङ्करहितो मातुः ।। ७७६।।


करुणारसार्द्रहृदया हृदयान्तरनिर्यदच्छवीचिस्मेरा ।

प्रमथेश्वरप्रियतमा पादप्रेष्यस्य भवतु कल्याणय ।। ७७७ ।।



कारणकार्यविभेदाद् रूपद्वितयं तवाम्ब यदृषिप्रोक्तम् ।

तत्रैकं भर्तुमिदं विहर्तुमन्यत्तु भूतभर्तुर्ललने ।। ७७८ ।।


श्रोतुं स्तोत्रविशेषं भक्तविशेषं च बोद्धुमयमीदृगिति ।

दातुं च वाञ्छितार्थं तव मातश्चन्द्रलोकरूपं भवति ।। ७७९ ।।


कीशकिशोरन्यायात् कारणरूपं तवाम्ब योगी धत्ते ।

ओतुकिशोरन्यायाद् भक्तं परिपासि कार्यरूपेण त्वम् ।। ७८०।।


दृढधारणा न चेत्त्वच्च्यवते योगी महेशनयनज्योत्स्ने ।

नायं ममेति भावस्तव यदि सद्यः सवित्रि भक्तं त्यजसि ।। ७८१।।


शिथिलधृतिर्योगी स्याद् बाद्यैर्विषयैर्नितान्तमाकृष्टो यः ।

स्वीयमतिलुप्यति ते भक्तेऽहन्ताप्रसारकलुषे मातः ।। ७८२।।


साहङ्कृतिर्न भक्तिः सबाह्यविषया धृतिर्न सर्वेश्वरि ते ।

अविजानन्तावेतद् भक्तो योगी च नैव सिद्धौ स्याताम् ।। ७८३।।


व्यक्तित्वादपि यस्य प्रियं त्वदीयं सवित्रि पादाम्भोजम् ।

सोऽद्भुतशक्तिर्भक्तो भगवति किं किं करोति नास्मिन् जगति ।। ७८४।।


व्यक्तित्वलोभविवशे सिद्धः कामोऽपि भवति समवच्छिन्नः ।

प्राप्तोऽपि सलिलराशि सलिलानि घटः कियन्ति सङ्गृह्णीयात् ।। ७८५।।


जीवन्नेव नरो यः सायुज्यं ते प्रयाति शम्भोः प्रमदे ।

सर्वे कामास्तस्य प्रयान्ति वशमाशु वीतविविधभ्रान्तेः ।। ७८६।।


व्यक्तित्वं तुभ्यमिदं मनीषया मे प्रदत्तमधिकारिण्या ।

बहुकालभोगबलतो विवदति देहो मदम्ब किं करवाणि ।। ७८७।।


स्थूलेन वर्ष्मणा सह सूक्ष्मा कलहं मतिर्न कर्तुं शक्ता ।

सुतरां बलवति मातर्बलाद् गृहाण स्वयं त्वमस्मात्स्वीयम् ।। ७८८।।


सर्वेषां हृदि यस्मात्त्वमसि प्राणात्मिकाम्ब हेतोस्तस्मात् ।

अखिलप्राण्याराधनमाराधननिर्विशेषमगपुत्रि तव ।। ७८९।।


जुह्वति केऽपि कृशानौ तस्मात्प्राप्तिस्तवेति सम्पश्यन्तः ।

अपरे प्राणिषु जुह्वति साक्षात्प्राणात्मिकाऽसि तेष्वन्तरिति ।। ७९० ।।


प्राणिष्वपि यः प्राणं भूतादिमनादिमात्मनि स्थितमनघम् ।

सततमुपास्ते योगी तस्मिन् होमेन तेऽम्ब तृप्तिस्सुलभा ।। ७९१।।


आत्मनि योऽम्ब श्रेष्ठे प्राणे प्राणान् जुहोति दहराभिमुखः ।

त्वद्रूपे हतपापे तेन जितं सकलमीशचित्तारामे ।। ७९२ ।।


उपसंहृतमखिलेभ्यो विषयेभ्यो निर्निमेषमन्तःकृष्टम् ।

हृदि दृढपदेन चक्षुस्त्वद्रूपे हूयते मदम्ब प्राणे ।। ७९३।।


अन्तस्स्वरं निगूढं श्रेष्ठप्राणस्य देवि तव भागस्य ।

शृण्वदिव प्रणवाख्यं श्रवणं तत्रैव भवति जगदम्ब हुतम् ।। ७९४।।


सर्वेषां मन्त्राणां स्तोत्राणां चेशचित्तनाथे प्रकृतौ ।

गूढं सदा स्वरन्त्यां प्राणन्त्यां त्वयि जुहोति मौनी वाचम् ।। ७९५।।


देहे स्खलति मनश्चेत् विषयेषु हुतं दधाति विषयात्मत्वम् ।

आवृत्तं यदि देहाद् सूक्ष्मायां त्वयि हुतं त्वदाकृति भवति ।। ७९६ ।।


त्वग्रसनघ्राणानामनुभूतीः प्राणशक्तिसात्कुर्वाणः ।

कं नार्पयते भोगं भगवति ते सर्वलोकपार्थिववनिते ।। ७९७।।


गच्छन् कुर्वन् विसृजन् रममाणश्चाम्ब सकललोकाधीशे ।

यः केवलां क्रियामपि चिन्तयते तेन नित्ययज्ञः क्रियते ।। ७९८ ।।


सर्वेषामग्ग्रीनां प्राणाग्निस्तव विभूतिरुक्तः श्रेष्ठः ।

तस्मिन्हुतं तु सुहुतं द्रव्याणि धियः क्रियाश्च मन्त्रः प्रणवः ।। ७९९ ।।


आर्यागीतीनामयमधरीकृतमधुसुधादिमाधुर्यरसः ।

वर्गो गणपतिवदनान्निष्क्रान्तो भवतु शर्वसुदृशः प्रीत्यै ।। ८०० ।।


।। समाप्तं च अष्टमं शतकम् ।।

bottom of page