काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
त्रयस्त्रिशः स्तबकः - वंशस्थवृत्तम्

“जपो योगोऽर्पणं च” — अर्थात् “जप, योग और आत्मसमर्पण” शीर्षक वाला यह तैंतीसवाँ स्तबक साधना के तीन प्रमुख मार्गों को एक ही दिव्यमाता की ओर ले जाने वाली परस्परपूरक विधियों के रूप में समन्वित करता है। श्री गणपति मुनि बताते हैं कि मन्त्रजप अन्तरंग शक्ति को पुष्ट और जागृत करता है, योगसाधना मन को शुद्ध, स्थिर और अन्तर्मुख बनाती है, और अर्पणम् — अर्थात् मन, व्यक्तित्व और अहंभाव को देवी के चरणों में समर्पित करना — उनके अनुग्रह को अत्यन्त प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करने का मार्ग है। इसलिए जपो योगोऽर्पणं च शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। पूरे स्तबक में मन्त्रसाधना, योगिक साक्षात्कार और अहंकार-समर्पण को एक ही उमा देवी तक पहुँचने वाले तीन परस्परपूरक मार्गों के रूप में मुनि तुलना करते हुए एकीकृत करते हैं।
इस स्तबक की एक प्रमुख विशेषता मन्त्र और प्रत्यक्ष आन्तरिक अनुभूति के बीच मुनि द्वारा किया गया भेद है। भुवनेश्वरी, काली और प्रचण्डचण्डी जैसे देवीरूपों को एक ही पराशक्ति की शक्तिशाली अभिव्यक्तियों के रूप में स्वीकार करते हुए भी वे स्पष्ट करते हैं कि तन्त्रशास्त्र का केवल बाह्य अथवा शब्दगत ज्ञान पर्याप्त नहीं है; प्रत्यक्ष अनुभव आवश्यक है। आगे के श्लोक अहं के मूल की खोज करने वाले अन्तर्मुख विचार की ओर बढ़ते हैं और रमण महर्षि द्वारा प्रतिपादित आत्मविचार-मार्ग का स्पष्ट स्मरण कराते हैं। “मैं” क्या स्वयं चेतना है? क्या वह प्राण का नाद है? अथवा तान्त्रिकों द्वारा वर्णित कुण्डलिनी है? — ऐसे प्रश्न उठाकर मुनि साधक को केवल पारिभाषिक शब्दों में उलझे रहने के बजाय प्रत्यक्ष अनुभूति की ओर ले जाते हैं।
मुनि यह भी संकेत करते हैं कि चेतना, आनन्द और जीवंत अनुभूति से रहित मुक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण नहीं मानी जा सकती। वास्तविक सिद्धि का अर्थ केवल बाह्य कर्मों से निवृत्त हो जाना नहीं, बल्कि ऐसी अवस्था है जिसमें चेतना भीतर दृढ़ता से प्रतिष्ठित हो और बाह्य व्यवहारों के बीच भी स्वतन्त्र तथा अखण्ड रूप से कार्य कर सके। इस प्रकार साधना का लक्ष्य किसी निर्जीव लय की अवस्था नहीं, बल्कि जागृत, आनन्दमय और स्वतन्त्र चेतनावस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस स्तबक में श्री गणपति मुनि की वैदिक और तान्त्रिक मन्त्रशास्त्र, कुण्डलिनीयोग, आत्मविचार, अद्वैततत्त्व और शरणागति के मनोविज्ञान पर असाधारण पकड़ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे मन्त्रतत्त्व की तकनीकी सूक्ष्मताओं को व्यक्तिगत आध्यात्मिक संघर्ष, दार्शनिक प्रश्नों और प्रत्यक्ष ध्यानोपदेश के साथ अत्यन्त प्रभावी ढंग से जोड़ते हैं।
दृढ़ वंशस्थ छन्द इस स्तबक को विचारपूर्ण होते हुए भी शक्तिशाली गति प्रदान करता है और साधना से अनुभव, तथा अनुभव से साक्षात्कार की ओर बढ़ने वाली यात्रा के लिए अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध होता है। अन्ततः इस स्तबक की मुख्य शिक्षा यही है कि जब साधक यह पहचान लेता है कि सोचना, देखना, बोलना और जानना — प्रत्येक क्रिया में कार्यरत शक्ति स्वयं जगन्माता ही हैं, तब जप, योग और आत्मसमर्पण — तीनों अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेते हैं।
नवमं शतकम्
त्रयस्त्रिशः स्तबकः - वंशस्थवृत्तम्
जपो योगोऽर्पणं च
सुधां किरन्तोऽखिलतापहारिणीं तमो हरन्तः पटलेन रोचिषाम् ।
श्रियं दिशन्तो दिशि दिश्यसङ्क्षयां जयन्ति शीताद्रिसुतास्मिताङ्कुराः ।।८०१।।
कृपाकटाक्षस्तव केन वाऽऽप्यते महेशशुद्धान्तपुरन्ध्रि कर्मणा ।
निरन्तरं मन्त्रजपेन वा मतेविंशोधनेनोत मनोर्पणेन वा ।।८०२।।
विशोधनाद्देवि मतेः प्रगृह्यसे मनोर्पणेनेशवधु प्रसीदसि ।
जपेन मन्त्रस्य शुभस्य वर्धसे जगत्त्रयीधात्रि कलेबरान्तरे ।। ८०३।।
मनःप्रतापस्य भवत्यसंशयं प्रवर्धनं वैदिकमन्त्रचिन्तनम् ।
प्रशस्यते प्राणमहःप्रदीपने दयान्वित े तान्त्रिकमन्त्रसेविता ।।८०४।।
तवाम्बिके तान्त्रिकमन्त्रमुत्तमं स्तवातिगं यः कनकाङ्गि सेवते ।
विचित्रयन्त्रादिव वैद्युतं महस्ततो विनिर्यद् भुवनं विगाहते ।। ८०५।।
न तस्य चेतो विकृतेर्वशे भवेन्न तस्य दृष्टिर्विषयैर्विकृष्यते ।
न तस्य रोगैरपकृष्यते वपुः सवित्रि यस्ते भजते महामनुम् ।। ८०६ ।।
स्मरन्ति मायां गगनाग्निशान्तिभिः सहाच्छभासा सहिताभिरम्बिके ।
तथा रसज्ञां द्रुहिणाग्निशान्तिभिर्भणन्ति दोग्ध्रीं तु खषष्ठबिन्दुभिः ।। ८०७।।
अभण्यताद्या भुवनेश्वरी बुधैरनन्तरा मातरगादि कालिका ।
प्रचण्डचण्डी परिकीर्तिता परा त्रयोऽप्यमी ते मनवो महाफलाः ।। ८०८ ।।
उपाधिभूतं शुचि नाभसं रजो दधाति साक्षाद् भुवनेश्वरीपदम् ।
तदाश्रया व्यापकशक्तिरद्भुता मनस्विनी काचन कालिकेरिता ।।८०९।।
अमर्त्यसाम्राज्यभृतः प्रवर्तिका विशाललोकत्रयरङ्गनर्तिका ।
पराक्रमाणामधिनायिकोच्यते प्रचण्डचण्डीति कला सवित्रि ते ।। ८१०।।
स्मरन्मनुं रोदिति भक्तिमांस्तव प्रगृह्य पादं मुनिरम्ब लम्बते ।
फलं चिराय प्रथमः समाप्नुयात् परो मरन्दं पद एव विन्दति ।। ८११।।
पदं तवान्विष्टमनेकदा मुदा हृदन्तरे स्पृष्टमिवेदमम्बिके ।
पलायतेऽधोऽहमनन्तरं शुचा परात्परे रोदिमि मन्त्रशब्दतः ।। ८१२।।
भणन्ति सन्तो मरुतां सवित्रि ते महामनुं त्वत्पदभास्करातपम् ।
ततो हि मूलात्स्वर एष निर्गतस्तपत्यघौघं जरयन्महोमयः ।। ८१३।।
सवित्रि साक्षाच्चरणस्य ते प्रभां विधारयँस्तज्जनिमूलमार्गणे ।
मुहुर्मुहुस्सोऽहमजे धृतोद्यमः पथा महर्षी रमणो बभाण यम् ।। ८१४ ।।
अहम्पदार्थो यदि चिल्लता तता किमेष दोग्ध्रीमनुभावतोऽपरः ।
अहं यदि प्राणनिनादवैखरी न कूर्च आख्यातुमसीत ि शक्यते ।। ८१५।।
परे तु यां चेतनशक्तिमामनन्त्यभाणि सा कुण्डलिनीति तान्त्रिकैः ।
विलक्षणा नाम चमत्कृतिर्जडान् प्रतारयत्यागमसारदूरगान् ।। ८१६ ।।
भवत्यखण्डानुभवः प्रबोधिनामतीव सूक्ष्मानुभवश्च योगिनाम् ।
करं गतास्सर्वविधाश्च शेरते महेश्वरीमन्त्रपरस्य सिद्धयः ।। ८१७।।
सहस्रसङ्ख्यानि जनूंषि वा मम प्रियाणि भक्तिस्तव चेद्भवे भवे ।
तव स्मृतिं चेद् गलयेन्न सम्मदं करोति मोक्षोऽपि ममेशवल्लभे ।। ८१८ ।।
विनैव दृष्टिं यदि सत्प्रशिष्यते न सत्तयाऽर्थः फलहीनया तया ।
इदं तु सत् किन्वसतो विशिष्यते न तात मुक्तोपलयोस्तदा भिदा ।। ८१९ ।।
शुचां निवृत्तिर्यदि मुक्तिरिष्यते सुखप्रवृत्तिर्यदि नात्र विद्यते ।
सदेव चेत्तत्र मतिर्न भासते जडं विमुक्ताद्वचसैव भिद्यते ।। ८२०।।
मतिः पराची व्यवहारकारणं भवेत्प्रतीची परमार्थसम्पदि ।
उभे दिशौ यस्य मतिर्विगाहते पदा च मूर्ध्वा च स सिद्ध इष्यते ।। ८२१।।
दृढं पदं यस्य मतेः सदाऽन्तरे स ना धियोऽग्रेण बहिश्चरन्नपि ।
सवित्रि मग्नस्त्वयि सम्प्रकीर्त्यते न तस्य भीः सञ्चरतोऽपि संसृतेः ।। ८२२।।
विचिन्तने चिन्तनशक्तिमद्भुतां विलोकने लोकनशक्तिमुज्वलाम् ।
प्रभाषणे भाषणशक्तिमुत्तमां निभालयंस्त्वां विषयैर्न जीयते ।। ८२३।।
विलोकमानस्य विलोकनं कवेर्विलोक्यमानेषु विहाय सक्तताम् ।
विलोचने सन्निहिता निरन्तरं विधूतभीतिर्विबुधस्तुता शिवा ।।८२४ ।।
अयं भयानां परिमार्जकस्सतां समस्तपापौघनिवारणक्षमः ।
मनोज्ञवंशस्थगणो गणेशितुर्मनो महेशाब्जदृशो धिनोत्वलम् ।।८२५।।
