काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
चतुस्त्रिशः स्तबकः - हरिणीवृत्तम्

“प्रार्थना” शीर्षक वाला यह चौंतीसवाँ स्तबक उमा सहस्रम् के सबसे व्यक्तिगत और हृदयस्पर्शी अंशों में से एक है। श्री गणपति मुनि जगन्माता की रक्षणशक्ति और उनके मन्त्रप्रभाव का स्मरण करते हुए आरम्भ करते हैं, और फिर लगभग सम्पूर्णतः प्रत्यक्ष प्रार्थना में प्रवेश कर जाते हैं। वे उमा देवी से देश की रक्षिका, मन की संरक्षिका, दुर्भाग्य से पीड़ित परिवारों की आश्रयदात्री तथा वर्षा और समृद्धि की मूल दैवीशक्ति के रूप में प्रार्थना करते हैं। इसलिए प्रार्थना शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। ये केवल स्तुति के श्लोक नहीं हैं, बल्कि मार्गदर्शन, संरक्षण, जीवन के उद्देश्य, आध्यात्मिक शक्ति और भारतवर्ष के कल्याण के लिए जगन्माता के सम्मुख रखी गई गहन व्यक्तिगत विनती हैं।
पूरे स्तबक में एक सशक्त आत्मकथात्मक प्रवाह दिखाई देता है। मुनि रमण महर्षि को गुहस्वरूप स्मरण करते हुए जगन्माता से सीधे प्रश्न करते हैं कि उनके जन्म का प्रयोजन क्या है और उन्हें कौन-सा दैवी कार्य सौंपा गया है। वे यह वेदना भी व्यक्त करते हैं कि जिन आध्यात्मिक शक्तियों का अनुभव पूर्व में हुआ था, वे अब मानो क्षीण हो गई हैं; वे अपने पूर्व दोषों को स्वीकार करते हैं और बार-बार पूछते हैं कि माता मौन क्यों हैं। मोक्ष, सिद्धियाँ, धन या काव्य-कीर्ति — इनमें से कोई भी उनकी प्रार्थना का परम लक्ष्य नहीं है। उनसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं ये प्रश्न: “मैं क्यों जन्मा हूँ? मुझे कौन-सा कार्य करना है? भारत की सेवा किस प्रकार करनी है? और अब तुम मुझे किस साधना-पथ पर चलाना चाहती हो?”
यह प्रार्थना अन्ततः एक व्यापक मंगल-संकल्प का रूप लेती है: भारतवर्ष दुःखमुक्त होकर विकसित हो; गणपति मुनि उसके कल्याण के लिए कार्य कर सकें; रमण महर्षि उसके महान् आध्यात्मिक मार्गदर्शक बने रहें; और जगन्माता उन दोनों पर अपना अनुग्रह बनाए रखें। इस प्रकार व्यक्तिगत आध्यात्मिक पुकार क्रमशः राष्ट्रधर्म, गुरुभक्ति और लोककल्याण की दिशा में विस्तृत हो जाती है।
प्रवाहपूर्ण हरिणी छन्द इस स्तबक के आत्मनिवेदन, प्रश्न, विरह, आकांक्षा और प्रार्थना के लिए अत्यन्त उपयुक्त है। यहाँ हमारे सामने केवल एक पण्डित, योगी या कवि नहीं, बल्कि ऐसा भक्त प्रकट होता है जो जगन्माता से अपने ही माता की तरह पूर्ण स्वाभाविकता और आत्मीयता से संवाद करता है — कहीं विनय से, कहीं वेदना से, और कहीं उत्तर पाने की तीव्र व्याकुलता से।
इसलिए यह स्तबक व्यक्तिगत आध्यात्मिक संकट, भारत के प्रति धर्मबोध, गुरुभक्ति, आत्मसमर्पण और काव्यात्मक तीव्रता का दुर्लभ समन्वय प्रस्तुत करता है। मुनि के अन्तरंग को अत्यन्त स्पष्ट रूप से उद्घाटित करने वाले उमा सहस्रम् के महत्त्वपूर्ण स्तबकों में प्रार्थना का विशेष स्थान है।
चतुस्त्रिशः स्तबकः - हरिणीवृत्तम्
प्रार्थना
विदितमहिमा विश्वाधानादनेकविधाद्भुतात्
प्रथितचरितः शर्वालोकप्रतापविवर्धनात् ।
प्रकटितगुणः पापध्वान्तप्रसारनिरोधनात्
प्रदिशतु शिवाह ासो भासां निधिः कुशलानि मे ।। ८२६ ।।
हृदि करुणया पूर्णा बाह्वोर्बलेन महीयसा
पदकमलयोर्लक्ष्म्या भक्तैर्जनैरुपजीव्यया ।
मुखसितकरे लावण्येन त्रिणेत्रदृशां बलं
बहु विदधता काली माताऽवतात्पदसेविनम् ।। ८२७।।
जगदधिपया सिद्धं दोग्ध्र्याऽथवोत रसज्ञया
मुनिजननुतं देवीमन्त्रं जपेद्यदि मानवः ।
अमृतजलदीभूतः पूतः प्रयोगविशेषवित ्
स इह वसुधालोके धारा गिरामभिवर्षति ।। ८२८ ।।
इममभिमुखीभूता शातोदरी कमलालया
हयगजघटापूर्णाऽभ्यर्णं समेत्य निषेवते ।
सविबुधमिदं विश्वं तस्य प्रयाति पुनर्वशं
प्रथितयशसां सिद्धीनां चाप्यमुं भजतेऽष्टकम् ।। ८२९ ।।
सुविमलधियस्तस्य क्रोधाद् दृगम्बुधुतद्युती
रिपुजनवधूगण्डाभोगो भवेदुत पाण्डुरः ।
सपदि भुवनव्याप्तं चाप्तैः प्रमाणपुरस्सरं
भणितमजरं भद्रं ज्योतिः परं हृदि भासते ।।८३०।।
अदयमरिभिः क्रान्ते राष्ट्र त्वमीश्वरि रक्षिका
सुमशरमुखैर्धूते चित्ते त्वमीश्वरि रक्षिका ।
प्रबलदुरितैर्ग्रस्ते वंशे त्वमीश्वरि रक्षिका-
ऽप्यसृजति जलं मेघे मोघे त्वमीश्वरि रक्षिका ।। ८३१।।
भगवति निजौ साक्षात्पुत्रौ बृहस्पतिपावकौ
गणपतिगुहावेतौ वेषान्तरव्यवहारतः ।
भरतधरणीखण्डे हेतोः कुतः कृतसम्भवौ
कलकलयुते काले देवि व्यधाः कथय द्रुतम् ।। ८३२ ।।
समयमयि ते धृत्वा पादाम्बुजं रमणः सुतो
गिरिवरगुहास्वन्तः शान्तो नयेद्यदि नाद्भुतम् ।
स्थलविरहतः स्वीयस्थाने किमत्र समागतो
न वदसि कुतः कार्यं तस्मै कुलाचलकन्यके ॥ ८३३॥
परिभणति चेच्छिष ्यव्यूहे महाद्भुतसङ्गती-
र्जननि रमणो योगीशानस्ततो बहु नो फलम् ।
अमिततमया दृष्टेः शक्त्या कदा सरणिं नये-
दपथपतितं धात्रीलोकं तदेव वदाम्बिके ।। ८३४॥
अहमिह कुतो हेतोर्जातो विषण्णतमे स्थले
चरणकमलच्छायां मायाधिराज्ञि विहाय ते ।
परमकरुणो घोरः शापः किमेष सवित्रि ते
किमपि भुवि वा कार्यं कर्तुं नियोजितवत्यसि ॥ ८३५॥
व्रजति विलयं स्नेहो दूरप्रवासवशादिति
प्रवदति बुधः कश्चित्सत्यं प्रभाति तदम्बिके ।
भगवति निजे कुक्षौ जातं दिवो धरणीगतं
स्मृतिसरणितो दूरे हा हा करोषि रुषा यथा ।। ८३६ ।।
मम तु विमला हृद्या विद्या महेश्वरि याऽभव-
न्मनसि च परा चित्रा शक्तिश्चिरन्तनि याऽभवत् ।
वचसि च महद्भाग्यं श्लाघ्यं यदीड्यतमेऽभवत्
तदयि गलितं मत्तो वित्तत्रयं भवतो भुवि ।। ८३७। ।
कृतमयि मया पापं घोरं सुकर्मसु सङ्गिनां
यदहमदयो विघ्नं नृणां मुहुर्मुहुराचरम् ।
अतिकटु फलं तस्याश्नामि श्रितो नरविग्रहं
प्रमथनृपतेर्जाये माये जनन्यव मामिमम् ।। ८३८ ।।
न भवसि दृशोर्मार्गे लोकाधिराज्ञि कुतो गिरो
न च बहुकृपे स्वप्ने वा त्वं प्रयच्छसि दर्शनम् ।
अपनयसि नो सन्देहं वा परोक्षकृपावशा-
दपि सुरनुते लग्ना कार्यान्तरे किमुतादया ।। ८३९।।
निरवधिशिवे माहात्म्यं ते भणन्ति महर्षयो
मनसि करुणा न न्यूना ते यथा प्रथिताः कथाः ।
तदिदमखिलं मिथ्या स्यादित्यसाध्यमुदीरितुं
यदसि विमुखी पुत्रे किं वा भवेदिह कारणम् ।। ८४०।।
भुवनभरणं नाल्पं कार्यं न देवि तव क्षणो
गुरु च बहुलं कृत्यं नित्यं तवास्ति न तन्मृषा ।
न तव कठिनं मौनं निन्द्यं तथापि न पार्वति
स्मर सकृदिमं दीनं पुत्रं तदेव ममाधिकम् ।।८४१।।
न भवति सुधाधारावर्षादयं मुदितस्तनौ
मधुमदमुषां वाचां सर्गान्न चाप्ययमुद्धतः ।
तव पदयुगे निष्ठालाभान्न तृप्यति चाप्ययं
भगवति चिरात् सन्देशं ते सुतः प्रतिवीक्षते ।। ८४२।।
किमिह भुवने कर्तव्यं मे किमर्थमिहागतो-
ऽस्म्यवनि जगतां कं वोपायं श्रये निजशक्तये ।
किमपि किमपि स्वान्ते ध्वान्ते यथा परिदृश्यते
स्फुटमभयदे वक्तुं किञ्चिच्छ्रमं त्वमुरीकुरु ।। ८४३।।
न मम परमे मुक्तावाशा न वा विभवाष्टके
न च गजघटापूर्णायां वा महेश्वरि सम्पदि ।
न च मधुमुचां वाचां सर्गे निरर्गलवैभवे
मुनिभुवि कुतो जातः सोऽहं तदेव समीर्यताम् ।। ८४४ ॥
प्रथममनघं वाञ्छाम्यन्नं सदारसुतातिथे-
र्भगवति ततः पादद्वन्द्वे तवाविचलां स्थितिम् ।
अथ सुरजगद्वार्ताज्ञानं सवित्रि ततः परं
मुनिभुवि भवे हेतुं ज्ञातुं मृगाक्षि पुरद्विषः ।। ८४५।।
यदि तव कृपा पुत्रे भक्ते पदाम्बुजवन्दिनि
व्रतशतकृशे शीर्षाम्भोजामृतं त्वयि जुह्वति ।
भरतधरणीसेवालोले भवप्रियभामिनि
स्वयमुपदिशामुष्मै योग्यं विधानमनाविलम् ।।८४६।।
जननि जगतां स्वल्पे कामेऽप्ययं त्वयि लम्बते
पुरभिदबले मध्ये कामेऽप्ययं त्वयि लम्बते ।
बहुलकरुणे श्रेष्ठे कामेऽप्ययं त्वयि लम्बते
भगवति परे वीते कामेऽप्ययं त्वयि लम्बते ।। ८४७।।
तनुभुवि मयि प्रीत्या वाऽम्ब त्रिलोकविधायिके
पदयुगरते वात्सल्याद्वा पुरारिपुरन्ध्रिके ।
स्वविमलयशोगानासक्ते कृपावशतोऽथवा
परुषमजरे मौनं त्यक्त्वा स्फुटी कुरु मे गतिम् ।। ८४८ ।।
जयतु भरतक्षोणीखण्डं विषादविवर्जितं
जयतु गणपस्तस्य क्षेमं विधातुमना मुनिः ।
जयतु रमणस्तस्याचार्यो महर्षिकुलाचलो
जयतु च तयोर्माता पूता महेशविलासिनी ।। ८४९।।
गणपतिमुनेरेषा भाषाविदां हृदयङ्गमा
सुकविसुहृदः शब्दैरत्युज्वला हरिणीततिः ।
ललितचतुरैर्भावैर्यान्ती सुरूपवनान्तरं
मदयतु मनः कामारातेर्निशान्तमृगीदृशः ।। ८५० ।।
