top of page

काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

पञ्चत्रिंशः स्तबकः - इन्दुवदनावृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“प्रार्थना” शीर्षक वाला यह पैंतीसवाँ स्तबक पिछले स्तबक में प्रवाहित अत्यन्त व्यक्तिगत प्रार्थना को और भी अधिक भाव-तीव्रता के साथ आगे बढ़ाता है। श्री गणपति मुनि बार-बार उमा देवी के चरणकमलों में शरण लेते हुए उनसे अपने वंश की रक्षा करने, संचित पापों का नाश करने, अपने जीवन-कार्य को स्पष्ट रूप से प्रकट करने और स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर चुके अपने इस भक्त को न छोड़ने की प्रार्थना करते हैं। इसलिए प्रार्थना शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। लगभग प्रत्येक श्लोक जगन्माता के प्रति एक प्रत्यक्ष निवेदन है, जिसमें रक्षा, मार्गदर्शन, अनुग्रह, जीवन-कार्य की स्पष्टता और अचल भक्ति की याचना की गई है।


इस स्तबक को विशेष रूप से उल्लेखनीय बनाती है जगन्माता के सम्मुख मुनि की असाधारण निष्कपटता। कहीं वे अत्यन्त कोमलता से विनती करते हैं, तो कहीं प्रेमपूर्ण चातुर्य और साहस के साथ देवी के मौन पर प्रश्न उठाते हुए पूछते हैं कि सर्वाधिकारिणी माता अपने सेवक को स्पष्ट आज्ञा क्यों नहीं देतीं। किन्तु इन प्रश्नों के पीछे असन्तोष नहीं, बल्कि पूर्ण शरणागति है। देवी उनकी इच्छाएँ पूर्ण करें या न करें, उनके परिवार की रक्षा करें या न करें, मुनि दृढ़तापूर्वक घोषित करते हैं कि वे स्वयं कभी भी देवी के चरणों का त्याग नहीं करेंगे। यह निश्चय उनकी भक्ति की परिपक्वता को प्रकट करता है।


आगे के श्लोकों में उनकी प्रार्थना व्यक्तिगत सीमा से ऊपर उठकर अधिक व्यापक करुणाभाव ग्रहण करती है। वे स्पष्ट रूप से अनुभव करते हैं कि जब तक दूसरे लोग दुःख में हैं, तब तक उनके लिए व्यक्तिगत शान्ति भी पूर्ण नहीं हो सकती। उनकी भक्ति यहाँ तक विस्तृत हो जाती है कि अपने लोगों और अपने समाज को दुःख से मुक्त होते देखना ही उनके लिए वास्तविक मुक्ति का रूप ले लेता है। इस प्रकार व्यक्तिगत प्रार्थना धीरे-धीरे सामूहिक उत्तरदायित्व, सहानुभूति और करुणामय सेवा-संकल्प में रूपान्तरित हो जाती है।


इस स्तबक में मुनि की रचना-शैली प्रत्यक्ष संवाद, भावों की स्पष्टता, भक्तिपूर्ण साहस और आत्मकथात्मक पारदर्शिता से परिपूर्ण है। प्रवाहमय इन्दुवदना छन्द बार-बार उठने वाली प्रार्थनाओं, प्रश्नों, शरणागति की प्रतिज्ञाओं और आत्मपरीक्षण को अत्यन्त सहजता से वहन करता है। यहाँ प्रकट होने वाला भक्त केवल व्यक्तिगत मोक्ष, सम्पत्ति या सिद्धियों की कामना करने वाला साधक नहीं है; वह अपने ऊपर आए व्यापक धर्मकार्य को पूरा करने के लिए आवश्यक शक्ति, दिशा और अनुग्रह माँगने वाला एक परिपक्व साधक है।

इसलिए यह स्तबक एक ओर माता के चरणों में शरणागत पुत्र की अत्यन्त आत्मीय प्रार्थना है, तो दूसरी ओर सेवा को केन्द्र में रखने वाली और अचल शरणागति पर आधारित आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि का प्रभावशाली उदाहरण भी है।


पञ्चत्रिंशः स्तबकः - इन्दुवदनावृत्तम्

प्रार्थना


अन्धतमसं शशिविभामभिदधाना

कान्तिमलमास्यकमलस्य विदधाना ।

अन्धकविरोधिदयितास्मितलवश्री-

र्भातु भुवनस्य सकलस्य कुशलाय ।। ८५१।।


भाहि विविधा कृतिमती द्विजसमूहे

पाहि गतिहीनमखिलेश्वरि कुलं नः ।

देहि बहुकालभजकाय वरमेतं

याहि नगनन्दिनि यशः शशिवलक्षम् ।। ८५२ ॥


वारयति घोरतरपातकसमूहं

वर्धयति धर्ममपि शर्मकरमन्ते ।

किङ्करजनस्य न किमावहति भव्यं

शङ्करपुरन्ध्रि तव पादपरिचर्या ।। ८५३।।


यस्य मनुजस्य हृदयेऽस्ति सदये ते

नाकचरसेव्यमयि पादसरसीजम् ।

तं भजति पद्ममुखि पद्मवनवासा

लाभभवने भवतु नामरपुरोधाः ।।८५४।।


यद्यखिलमौनिगणगीतगुणजालं

कालभयहारिकरुणारसमरन्दम् ।

अद्रितनयाङ्घ्रिजलजन्म हृदये स्या-

दष्टमगतोऽपि विदधातु रविजः किम् ।। ८५५।।


लेखललनाकचसुमैः कृतबलिं ते

यो भजति पादघृणिमालिनमनन्ते ।

निस्तरति नूनमयमस्तमितमोहः

शोकतिमिरं सकललोकगणमातः ।। ८५६।।


शीतकरदर्पहरवक्त्रजलजाते

शीतगिरिनन्दिनि तवाङ्घ्रिजलजातम् ।

यः स्मरति देवि हृदि विस्मरति सोऽयं

विष्टपमशेषमपि कष्टततिमुक्तः ।। ८५७ ।।


सक्तिरयि यस्य तव पादसरसीजे

शक्तिधरमातरनलाक्षगृहनाथे ।

पूर्णशशिजैत्रमुखि पुण्यपुरुषोऽसौ

स्वर्णशिखरीव बुधलोकशरणं स्यात् ।। ८५८।।


वैरिगणनिर्दलनखड्गवरपाणे

वाससि पदोर्दशनवाससि च शोणे ।

नेत्रमिषपावकविशेषितललाटे

पापमखिलं जहि मृगाधिपतिघोटे ।। ८५९।।


वेदचयवेदिजनवादविषयस्य

प्रीतियुतलोकततिशोकशमनस्य ।

वेतनविवर्जितभटोऽयमहमङ्घ्रेः

शीतकरपोतधरपुण्यवनिते ते ।। ८६०।।


कार्यमयि मे किमपि कार्यपटुबुद्धेः

पादसरसीजयुगलीपरिजनस्य ।

अम्ब वद जम्भरिपुगीतगुणजाले

शुम्भकुलनाशकरि शम्भुकुलयोषे ।।८६१।।


त्वं यदि शिलावदयि नो वदसि कृत्यं

नास्ति तव राज्यपटुबुद्धिरिति सत्यम् ।

आदिश यथार्हकरणीयकृतिनित्यं

राज्ञि भुवनस्य चरणाम्बुरुहभृत्यम् ।। ८६२।।


पञ्चसु विहाय मनसः कमपि सङ्गं

पुत्रधनमित्रजनबान्धववधूषु ।

एष भजते जननि पादजलजं ते

पालय नु मुञ्च नु तवोपरि स भारः ।। ८६३ ।।


वज्रधरमुख्यसुरसञ्चयकिरीट-

स्थापितमहार्घमणिरञ्जितनखाय ।

जीवितमदायि जगदीश्वरि मदीयं

पादजलजाय तव पालय नु मा वा ।। ८६४।।


देहि जगदीश्वरि न वा मदभिलाषं

पाहि करुणावति न वा कुलमिदं नः ।

शूलधरकामिनि सुरासुरनिषेव्यं

पादकमलं तव परे न विजहामि ।। ८६५।।


पासि किल पादयुगकिङ्करसमूहं

हंसि किल पापततिमापदि नुता त्वम् ।

दन्तिवदनप्रसु वदन्ति मतिमन्तो

नानृतमिदं भवतु नाकिजनवर्ण्ये ।। ८६६।।


शक्रमुखदेवततिवन्दितविसृष्टे

वक्रघनकेशि चरणे तव लुठन्तम् ।

आपदि निमग्नमिममाश्रितमनाथं

नन्दिहयसुन्दरि न पालयसि केन ।।८६७।।


घोषमयमम्ब विदधाति पदलग्नो

नावसि पुराणि किमु नारि बधिराऽसि ।

वन्दिसुरबृन्दनुतिभाषितहृतं वा

कर्णयुगलं तव कपालिकुलयोषे ।। ८६८ ।।


अम्ब भव बिम्बफलकल्परदचेले

शम्बरसपत्नबलकारिबहुलीले ।

प्रागमृतभानुमुकुटस्य मदयित्री

तं कुरु ततः परमुरीकृतमदर्थम् ।। ८६९।।


निर्मलसुधाकरकलाकलितमस्ते

धर्मरतपालिनि दयावति नमस्ते ।

एतमव देवि चरणाम्बुरुहबन्धुं

शीतधरणीधरसुते गमय नान्धुम् ।।८७०।।


अद्रिकुलपालककुलध्वजपताके

भद्रगजगामिनि दरिद्रमयि मत्या ।

क्षुद्रमिव शोच्यमिममङ्घ्रिजलजाप्तं

रुद्रदयिते जननि पाहि न जहीहि ।। ८७१।।


अस्तु तव पादकमले स्थितिरजस्रं

नास्ति परदुःखविवशे हृदि तु शान्तिः ।

अस्तु करुणेऽयमस्तु मतिलोपः

कष्टमिदमम्ब मम भूरि परिशिष्टम् ।। ८७२ ।।


दुःखसुखभेदरहिता न मतिरासीत्

साधुखलभेदरहिता न मतिरासीत् ।

भाग्यमतिमान्यमथवा मम तदेत-

न्मातरिह सङ्घभजने यदवकाशः ।। ८७३।।


अस्तु मम भेदमतिरस्तु मम पक्षो

यत्नपरताऽस्तु मम मास्तु च विमोक्षः ।

मोक्षमयि वेद्मि कुलकष्टततिमोक्षं

प्रेषय सकृत्तव महेश्वरि कटाक्षम् ।। ८७४।।


शाक्वरगणेन मुखरेऽत्र गणनाथे

विष्णुयशसीशवधु जिष्णुमुखवन्द्ये ।

अम्ब करुणां कुरु शिवङ्करि निरङ्क-

स्वच्छकिरणार्भकविभूषितललाटे ।।८७५।।

bottom of page