top of page

काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

षट्त्रिंशः स्तबकः - तूणकवृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“प्रकीर्णकम्” — अर्थात् “विविध विषयों का समाहार” शीर्षक वाला यह छत्तीसवाँ स्तबक उमा देवी से सम्बद्ध अनेक भक्तिपरक, दार्शनिक और ध्यानमय भावों को किसी एक विषय तक सीमित किए बिना एक साथ समेटता है। देवी का सौन्दर्य, उनकी रक्षणशक्ति, विश्वाधिपत्य, उग्ररूप, करुणा, मातृत्व, अर्धनारीश्वर तत्त्व, अरुणाचल में उनका निवास तथा समस्त जीवों के हृदय में उनकी अन्तर्यामिनी उपस्थिति — ये सभी भाव इन श्लोकों में विविध रूपों से प्रकट होते हैं। इसलिए प्रकीर्णकम् शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। यद्यपि स्तबक अनेक विषयों के बीच स्वतंत्र रूप से विचरता है, फिर भी उनका आन्तरिक आशय अन्ततः एक ही सत्य में संगम करता है: उमा देवी ही परम आश्रय, रक्षणशक्ति, अन्तरंग चेतनबल और सम्पूर्ण विश्व की जगन्माता हैं।


कुछ श्लोक इस भाव को और अधिक गहराई देते हुए बताते हैं कि देवी किसी एक मूर्ति अथवा एक पौराणिक रूप तक सीमित नहीं हैं। वे देवताओं की रक्षिका और आसुरी शक्तियों की संहारिणी हैं; साथ ही श्वास, दृष्टि, चेतना, ताप और नाद में अन्तर्निहित होकर कार्य करने वाली शक्ति भी वही हैं। कर्मकाण्ड के द्वारा, वैदिक स्तुतियों के माध्यम से और ध्यानमार्ग से जिसकी उपासना की जाती है, वह भी वही एक पराशक्ति है। मुनि पुनः शिव-शक्ति के ऐक्य को प्रतिपादित करते हुए दिखाते हैं कि यद्यपि वे स्त्री और पुरुष तत्त्व के रूप में दो दिखाई देते हैं, वास्तव में वे एक ही प्रकाशमय दिव्यस्वरूप हैं। इस प्रकार यह स्तबक पूरे ग्रन्थ में बार-बार प्रकट हुए भक्ति, शक्तितत्त्व, सूक्ष्मशरीर-अनुभव, दैवी संरक्षण और अद्वैतभाव जैसे विषयों का एक व्यापक समन्वय बन जाता है।


इस स्तबक में मुनि की काव्यप्रतिभा तीव्र और गम्भीर नाद से युक्त तूणक छन्द में विशेष रूप से प्रकट होती है। शक्तिशाली पदावली, संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली बिम्ब और दृढ़ लय से सम्पन्न स्तुति को यह छन्द अत्यन्त समर्थ रूप से वहन करता है। एक ओर वे देवी के दिव्य स्वरूप का कोमल सौन्दर्य के साथ वर्णन करते हैं, तो दूसरी ओर अत्यन्त सघन परतत्त्व-वाक्यों को भी सहजता से प्रस्तुत करते हैं। शृङ्गार, मन्त्रतत्त्व, शाक्तदर्शन, योग और भक्तिपूर्ण प्रार्थना — इन सब पर उनका गहरा अधिकार यहाँ समग्र रूप से दिखाई देता है।


नवम शतक के समापन स्तबक के रूप में यह प्रकीर्णकम् अनेक रंगों के पुष्पों से निर्मित एक माला जैसा प्रतीत होता है। उमा देवी के विविध रूप, शक्तियाँ और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ एक ही भक्तिमय अर्पण में पिरोई गई हैं और अन्ततः उनकी प्रसन्नता तथा उनके चरणभक्तों की रक्षा के लिए समर्पित होती हैं।


षट्त्रिंशः स्तबकः - तूणकवृत्तम्

प्रकीर्णकम्


उन्नतस्तनस्थलीविलोलहारमौक्तिक-

व्रातदीधितिप्रतानबद्धसौहृदा सदा ।

अन्धकारिकामिनीदरस्मितद्युतिर्भुनो-

त्वन्धकारमन्तरङ्गवासिनं घनं मम ।।८७६।।


अम्बरस्थले पुरा पुरन्दरो ददर्श यां

यां वदन्ति पर्वतप्रसूतिमैतिहासिकाः ।

सा परा पुरामरेः पुरन्ध्रिकाऽखिलाम्बिका

पुत्रकाय मज्जते ददातु दक्षिणं करम् ।। ८७७।।


पादपङ्कजे धृता नरैरबाह्यभक्तिभिः

पाणिपङ्कजे धृता नवेन्दुखण्डधारिणा ।

चारुहेमहंसका मनोज्ञरत्नकङ्कणा

लोकजालपालिनी पुनातु मां विलासिनी ।। ८७८ ।।


उक्षराजवाहनस्य जीविताद् गरीयसी

पक्षिराजवाहनादिवर्ण्यमानवैभवा ।

केकिलोकचक्रवर्तिवाहनेन पुत्रिणी

वारणारिसार्वभौमवाहना गतिर्मम ।। ८७९ ।।


बालकुन्दकुट्मलालिकान्तदन्तपङ्क्तिका

कुण्डलानुबिम्बशोभिशुद्धगण्डमण्डला ।

बिभ्रती रतीशवेत्रविभ्रमं ध्रुवोर्युगं

शुभ्रभानुशेखरस्य सुन्दरी प्रणम्यते ।। ८८०।।


आजिदक्षवाहवैरियातुधानबाधितं

या ररक्ष देवबृन्दमिन्दिरादिवन्दिता ।

सा कटाक्षपातधूतभक्तलोकपातका

पावकाक्षसुन्दरी परात्परा गतिर्मम ।। ८८१।।


तारकाधिनाथचूडचित्तरङ्गनर्तकी

मन्दहाससुन्दरास्यपङ्कजा नगात्मजा ।

दीनपोषकृत्यनित्यबद्धबुद्धिरव्यया

गृह्यते गणाधिपेन सर्वतो नृणां पदे ।। ८८२।।


अष्टमीशशाङ्कखण्डदर्पभञ्जनालिका

विष्टपत्रयाधिनाथमानसस्य डोलिका ।

पापपुञ्जनाशकारिपादकञ्जधूलिका

श्रेयसे ममास्तु शैललोकपालबालिका ।।८८३।।


सानुमत्कुलाधिनाथबालिकालिकुन्तला

जङ्गमेव काऽपि तप्तहेमसालभञ्जिका ।

भक्तियुक्तलोकशोकवारणाय दीक्षिता

शीतशीतवीक्षिता लघु स्यतादघं मम ।। ८८४।।


पुण्यनामसंहतिः पुरारिचित्तमोहिनी

पुष्पबाणचापचारुझिल्लिकाऽखिलाम्बिका ।

पुण्यवैरिपुष्टदुष्टदैत्यवंशनाशिनी

पुत्रकस्य रक्षणं पुरातनी करोतु मे ॥ ८८५।।


क्षाममध्यमस्थली सुधाघटोपमस्तनी

कृष्णसारलोचना कुमुद्वतीप्रियानना ।

भूविलासधूतधैर्यकाञ्चनाद्रिकार्मुका

काचिदिक्षुकार्मुकस्य जीविका जयत्युमा ।। ८८६।।


लोहिताचलेश्वरस्य लोचनत्रयीहिता

लोहितप्रभानिमज्जदब्जजाण्डकन्दरा ।

हासकान्तिवर्ध्यमानसारसारिमण्डला

वासमत्र मे करोतु मानसे महेश्वरी ।। ८८७।।


दक्षिणेक्षणप्रभाविजृम्भिताम्बुसम्भवा

काममित्रवामनेत्रधामतृप्तकैरवा ।

एकतः परः पुमान्परा वराङ्गनाऽन्यतः

शुभ्रकीर्तिरेकमूर्तिरादधातु नश्शिवम् ।। ८८८ ।।


शुम्भदैत्यमारिणी सुपर्वहर्षकारिणी

शम्भुचित्तहारिणी मुनीन्द्रचित्तचारिणी ।

कामितार्थदायिनी करिप्रकाण्डगामिनी

वीतकल्कमादधातु विघ्नराजमम्बिका ।। ८८९।।


देवतासपत्नवंशकाननानलच्छटा

वारणारिसार्वभौमवाहना घनालका ।

नन्दिवाहनस्य काऽपि नेत्रनन्दिनी सुधा

नेत्रलाञ्छितालिका सुतं पुनातु कालिका ।। ८९०।।


राजसुन्दरानना मरालराजगामिनी

राजमौलिवल्लभा मृगाधिराजमध्यमा ।

राजमानविग्रहा विराजमानसद्गुणा

राजते महीधरे मदम्बिका विराजते ।। ८९१।।


पर्वचन्द्रमण्डलप्रभाविडम्बनानना

पर्वताधिनाथवंशपावनी सनातनी ।

गर्वगन्धनाशिनी विभावरीविचारिणां

शर्वचित्तनायिका करोतु मङ्गलं मम ।। ८९२।।


ओजसश्च तेजसश्च जन्मभूमिरच्युता

नीलकञ्जबन्धुबद्धमौलिरागमस्तुता ।

वीतरागपाशजालनाशबद्धकङ्कणा

विश्वपालिनी मया महेश्वरी विचिन्त्यते ।। ८९३।।


अण्डमण्डलं यया निरन्तरं च पच्यते

संस्फुरत्यशेषभूतहार्दपीठिकासु या ।

श्वासदृष्टिसंविदूष्मनादवारिवर्त्मभि-

र्यामुपासते विदो नमामि तां परात्पराम् ।। ८९४।।


पञ्चयुग्मवेषभृत्परात्परा सुरार्चिता

पञ्चवक्त्रवक्त्रपद्मचञ्चरीकलोकना ।

वञ्चकान्तरङ्गशत्रुसञ्चयप्रणाशिनी

प्रेतमञ्चशायिनी कुलं चिराय पातु मे ।। ८९५।।


कर्मणा यथाविधि द्विजातयो यजन्ति यां

ब्रह्मणा यथाश्रुतं स्तुवन्ति यामधीतिनः ।

चेतसा यथा गुरूक्ति चिन्तयन्ति यां विदः

सा परा जगत्त्रयीजनन्यजा जयत्युमा ।। ८९६।।


वासुदेवजायया विनम्रया निषेविता

वामदेवचाटुचित्रवाक्यबन्धलालिता ।

वासवादिदेवताजयप्रणादहर्षिता

वारयत्वघानि मे वसुन्धराभृतस्सुता ।। ८९७।।


पूर्णिमासुधामरीचिसुन्दरास्यमण्डला

फुल्लपद्मपत्रदीर्घसम्प्रसन्नलोचना ।

पुण्यभूनिषेवणाय पुत्रमेतमुद्यतं

पूर्णकाममादधातु पादलग्नमम्बिका ।। ८९८ ।।


लालयन्ति बालकं वतंसशीतदीधितिं

शीलयन्ति सूक्ष्मतां मनांसि योगिनामिव ।

कालयन्तु पापिनां कुलानि संहतीस्सतां

पालयन्तु च स्मितानि योषितः पुरद्विषः ।। ८९९।।


पादसेविनः कवेर्मनोहरातिशक्वरी-

वर्ग एष नाट्यकारिनिर्जरीगणो यथा ।

लोकजालचक्रवर्तिपुण्ययोषितो मन-

स्सम्मदाय साधुकष्टवारणाय कल्पताम् ।। ९०० ।।


।। समाप्तं च नवमं शतकम् ।।

bottom of page