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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

सप्तत्रिंशः स्तबकः - अनुष्टुब्वृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“तत्त्वविचारः” — अर्थात् “परमतत्त्व का विवेचन” शीर्षक वाला यह सैंतीसवाँ स्तबक उमा सहस्रम् के सबसे दार्शनिक अंशों में से एक है। श्री गणपति मुनि ब्रह्म, चेतना, ज्ञान, शक्ति, आकाश, अभिव्यक्ति और जगत् — इन सबके पारस्परिक सम्बन्ध का अत्यन्त सूक्ष्म परीक्षण करते हैं। वे प्रश्न उठाते हैं कि ज्ञान क्या ज्ञाता का कोई गुण है, कोई क्रिया है, अथवा स्वयं ज्ञाता का स्वरूप ही है। उनका विचार अन्ततः अद्वैत की दिशा में आगे बढ़ता है: जिस प्रकार दीपक से उसके प्रकाश को वास्तव में अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार चेतना और उसकी शक्ति को भी भाषा अथवा व्यवहार की दृष्टि से भिन्न कहा जा सकता है, किन्तु प्रत्यक्ष अनुभूति में वे वास्तविक रूप से अविभाज्य हैं। इसलिए तत्त्वविचारः शीर्षक पूर्णतः सार्थक है; पूरा स्तबक सत्य का वास्तविक स्वरूप क्या है — इस मूल प्रश्न पर निरन्तर दार्शनिक अनुसन्धान के रूप में विकसित होता है।


इसके बाद मुनि सृष्टि अथवा अभिव्यक्ति से सम्बन्धित एक सूक्ष्म सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। जिस प्रकार व्यक्तिगत चेतना में स्वप्नरूप प्रकट होते हैं, उसी प्रकार यह जगत् समष्टि अथवा विश्वचेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। प्रकृति ही परम देवी हैं और व्यक्तिगत जीव उनके विविध परिणत रूप हैं; फिर भी उन सभी को पुनः अपने भीतर समाहित कर लेने वाला आधारसत्य भी वही हैं। वही पराशक्ति देहधारियों में अनुभव-चेतना के रूप में प्रवेश करके ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के रूप में विभक्त-सी होकर ज्ञानेंद्रियों, मन, कर्मेंद्रियों और प्राणशक्ति के माध्यम से कार्य करती है। अन्ततः “क्या क्रिया ज्ञान पर निर्भर है, अथवा ज्ञान क्रिया पर?” जैसे प्रश्न के द्वारा मुनि साधक को फिर उसी एक आत्मशक्ति की ओर ले जाते हैं, जिसका साक्षात्कार अमृतत्व की दिशा खोलता है।


इस स्तबक में मुनि का प्रमुख स्वरूप तत्त्वदर्शी दार्शनिक का है। संक्षिप्त अनुष्टुभ् छन्द में वे ज्ञानमीमांसा, सत्तातत्त्व, विश्वसृष्टि और शाक्त परतत्त्व जैसे जटिल विषयों को अत्यन्त सटीकता से निरूपित करते हैं। फिर भी उमा देवी को ईक्षाशक्ति के रूप में देखने वाली दैवी भाषा कहीं छूटती नहीं। इसलिए यह केवल शुष्क दार्शनिक चर्चा नहीं है, बल्कि वेदान्तीय अद्वैत, शक्तितत्त्व और प्रत्यक्ष चेतनानुभव को एक ही समग्र दृष्टि में समन्वित करने वाला गम्भीर तत्त्वचिन्तन है।


अन्त में मुनि इन श्लोकों को गम्भीर “कालिका-तत्त्व-कारिकाओं” के रूप में प्रस्तुत करते हैं — अर्थात् दिव्यशक्ति के स्वरूप पर रचित संक्षिप्त दार्शनिक सूत्रों के रूप में — और उन्हें विद्वानों के आनन्द तथा मनन के लिए अर्पित करते हैं। इस प्रकार यह स्तबक उमा के दिव्य व्यक्तित्व के पीछे स्थित परम शक्तिसत्य का अन्वेषण करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि चेतना, शक्ति और जगत् अन्ततः एक ही आधारभूत परमसत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं।


दशमं शतकम्

सप्तत्रिंशः स्तबकः - अनुष्टुब्वृत्तम्

तत्त्वविचारः


उद्दीपयतु नश्शक्तिमादिशक्तेर्दरस्मितम् ।

तत्त्वं यस्य महस्सूक्ष्ममानन्दो वेति संशयः ।। ९०१।।


पूर्णं प्रज्ञातृ सद्ब्रह्म तस्य ज्ञानं महेश्वरी ।

महिमा तेज आहोस्विच्छक्तिर्वा प्राण एव वा ।। ९०२।।


प्रचक्षते चिदात्मत्वं ज्ञातुर्ज्ञानस्य चोभयोः ।

प्रदीपस्य प्रभायाश्च ज्योतिराकृतितां यथा ।। ९०३ ।।


चित एकपदार्थत्वाच्चिच्चिता न विशिष्यते ।

तस्माद् गुणत्वं ज्ञानस्य शङ्करेण निराकृतम् ।। ९०४।।


ज्ञातुर्ज्ञानं स्वरूपं स्यान्न गुणो नापि च क्रिया ।

यदि स्वस्य स्वरूपेण वैशिष्ट्यमनवस्थितिः ।। ९०५।।


वाचैव शक्यते कर्तुं विभागस्स्वस्वरूपयोः ।

नानुभूत्या ततो द्वैतं सच्छक्त्योर्व्यावहारिकम् ।। ९०६।।


ब्रह्मज्ञानस्य पूर्णस्य विषयो द्यौरुदीर्यते ।

सा ब्रह्मणो व्यापकत्वाद्वस्तुतो नातिरिच्यते ।।९०७।।


विकासादपि सङ्कोचात् सर्गप्रलययोर्द्वयोः ।

प्रज्ञानस्य बुधैरुक्तौ जन्मनाशावुभौ दिवः ।। ९०८ ।।


धर्मभूतं परस्येदं न कार्यं परमं नभः ।

अखण्डत्वान्न विकृतिर्विश्वस्मिन्नप्रकृतित्वतः ।। ९०९।।


आकाशे परमे दीप्यत् प्रज्ञानं परमात्मनः ।

एकाग्रत्वात्प्रवृद्धोष्मगभीरमभवन्महः ।। ९१० ।।


त्रिधैवं धर्मभूतस्य ज्ञानस्य विकृतिं विना ।

शुद्धत्वविषयत्वाभ्यां महस्त्वाच्च दशात्रयम् ।। ९११ ।।


विज्ञाने भाति ये भान्ति भावा द्रव्यगुणादयः ।

न किञ्चिदनुभूयन्ते विज्ञानोपरमे तु ते ।। ९१२ ।।


एवं स्वतः प्रकाशत्वं विषयाणां न दृश्यते ।

सिद्धिश्च परतो न स्यात् सम्बन्धं कञ्चिदन्तरा ।। ९१३।।


दृश्यते विषयाकारा ग्रहणे स्मरणे च धीः ।

प्रज्ञाविषयतादात्म्यमेवं साक्षात्प्रदृश्यते ।। ९१४ ।।


न चेत्समष्टिविज्ञानविभूतिरखिलं जगत् ।

विषयव्यष्टिविज्ञानतादात्म्यं नोपपद्यते ।। ९१५।।


यथाऽस्मदादिविज्ञाने ध्येयं बुद्धिरिति द्वयम् ।

पूर्णे समष्टिविज्ञाने विकृतिः प्रकृतिस्तथा ।। ९१६।।


परिणामो यथा स्वप्नः सूक्ष्मस्य स्थूलरूपतः ।

जाग्रत्प्रपञ्च एष स्यात्तथेश्वरमहाचितः ।। ९१७।।


विकृतिस्सर्वभूतानि प्रकृतिः परदेवता ।

सतः पादस्तयोराद्या त्रिपादी गीयते परा ।। ९१८ ।।


कबलीकृत्य सङ्कल्पानेकाऽपि स्याद्यथा मतिः ।

भूतानि कबलीकृत्य देवताऽपि तथा परा ।। ९१९।।


भूतानामात्मनस्सर्गे संहृतौ च तथाऽऽत्मनि ।

प्रभवेद्देवता श्रेष्ठा सङ्कल्पानां यथा मतिः ।। ९२०।।


अनुभूत्यात्मिका सेयमीशशक्तिः परात्परा ।

आधारचक्रे पिण्डेषु विराजति विभिन्नवत् ।। ९२१ ।।


सूक्ष्मस्थूले ततः शाखे विद्युच्छक्तिसमीरवत् ।

तत्राद्या ज्ञानशक्तिस्स्यात् क्रियाशक्तिरनन्तरा ।। ९२२ ।।


ज्ञानेन्द्रियाणि प्रथमा विभूतिर्मनसा सह ।

कर्मेन्द्रियाणि त्वपरा विभूतिस्सहसा सह ।। ९२३ ।।


क्रियामूलमुत ज्ञानमूलं किमिति चिन्तयन् ।

आत्मशक्तिमितो विद्वानमृतत्वाय कल्पते ।। ९२४ ।।


गभीरास्सुतरामेताः कालिकातत्त्वकारिकाः ।

धियो भासो गणपतेर्भवन्तु विदुषां मुदे ।। ९२५।।

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