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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

अष्टत्रिंशः स्तबकः - पादाकुलकवृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“दशमहाविद्याः” — अर्थात् “दस महान् ज्ञानशक्तियाँ” शीर्षक वाला यह अड़तीसवाँ स्तबक महाविद्याओं को अलग-अलग देवियों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही पराशक्ति की विविध कार्यरूप अभिव्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करता है। श्री गणपति मुनि पहले चेतना के प्रवाह को सूक्ष्म केन्द्रों के माध्यम से समझाते हैं — हृदयपद्म से द्विदल केन्द्र, सहस्रदल-पद्म और वहाँ से शरीर तथा इन्द्रिय-जगत् तक चेतना किस प्रकार फैलती है, और फिर अन्तर्मुख होकर अपने मूल में किस प्रकार लीन होती है। इसी योगदृष्टि में ललिता, ऐन्द्री/छिन्नमस्ता, भद्रकाली, भैरवी, भुवनेश्वरी, ज्येष्ठा, तारा, मातंगी, बगला और कमला — इन सबको एक ही दिव्यशक्ति की भिन्न अभिव्यक्तियों के रूप में समझाया गया है। इसलिए दशमहाविद्याः शीर्षक महाविद्या-परम्परा की योगिक और तात्त्विक व्याख्या करने वाले इस स्तबक के स्वरूप के लिए पूर्णतः उपयुक्त है।


इस स्तबक की मुख्य दार्शनिक शिक्षा यह है कि इन शक्तियों के बीच दिखाई देने वाली अनेकता स्वरूपभेद के कारण नहीं, बल्कि कार्यभेद के कारण है। काली रूपान्तरण की शक्ति हैं; कपालभेद की अवस्था में तीव्र रूप से प्रकट होने वाली शक्ति ऐन्द्री अथवा छिन्नमस्ता है; विषयानुभवों के सम्पूर्ण क्षेत्र में विस्तृत चेतनाशक्ति भुवनेश्वरी है; जब सारी अभिव्यक्ति अपने मूल में पुनः समाहित हो जाती है, वह ज्येष्ठा की अवस्था है; वाणी की पश्यन्ती अवस्था तारा है; वही वाक्शक्ति जब व्यक्त शब्द के रूप में प्रवाहित होती है, तो मातंगी कहलाती है; गति को रोकने और नियंत्रित करने वाली शक्ति बगला है; और बाहर की ओर विस्तृत शक्ति-वैभव कमला के रूप में व्यक्त होता है। इस प्रकार मुनि देवीरूपों को केवल बाह्य मूर्तियों के रूप में नहीं, बल्कि चेतना की विशिष्ट अवस्थाओं, शक्तिक्रियाओं और योगिक अनुभवों के रूप में व्याख्यायित करते हैं।


मुनि इस तात्त्विक निरूपण को प्रत्यक्ष साधना से भी जोड़ते हैं। सजगता, प्राणसाधना, मौन, उद्गीथ, स्तुति, आसन और अन्तर्मुख एकाग्रता जैसे मार्गों द्वारा इन शक्तियों की उपासना किस प्रकार की जा सकती है, इसका भी संकेत मिलता है। इसलिए महाविद्या-तत्त्व यहाँ केवल देवियों की सूची बनकर नहीं रह जाता, बल्कि साधक के भीतर चेतना के विभिन्न स्तरों को पहचानने, जागृत करने और उनका साक्षात्कार करने वाला योगमार्ग बन जाता है।


इस स्तबक में श्री गणपति मुनि का शाक्ततन्त्र, कुण्डलिनीयोग, वाक्तत्त्व, सूक्ष्मशरीर-सिद्धान्त और ध्यान-मनोविज्ञान पर गहरा अधिकार विशेष रूप से प्रकट होता है। उनकी पद्धति सदैव की तरह समन्वयात्मक है: वे परम्परागत देवीरूपों को केवल प्रतिमा अथवा बाह्य उपासना की दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष चेतना-संरचनाओं और योगिक अनुभवों के साथ जोड़ते हैं। तीव्र गति वाला पादाकुलक छन्द इन जटिल तात्त्विक सम्बन्धों को अत्यन्त संक्षिप्त और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।


अन्तिम श्लोक पूरे स्तबक के सार को सुन्दर ढंग से समेटता है: परमेश्वर की एक ही शक्ति अनन्त रूपों में प्रकट होती है; ये श्लोक केवल उसके विविध स्वरूपों को ही नहीं, बल्कि उनसे सम्बन्धित उपासना और साक्षात्कार के मार्गों को भी उद्घाटित करते हैं।


अष्टत्रिंशः स्तबकः - पादाकुलकवृत्तम्

दशमहाविद्याः


दूरीकुरुताद् दुःखं निखिलं दुर्गायास्तद्दरहसितं नः ।

रचितस्याम्भोमृद्भ्यां यदभूल्लेपनममलं ब्रह्माण्डस्य ।। ९२६ ।।


जन्तौ जन्तौ भुवि खेलन्ती भूते भूते नभसि लसन्ती ।

देवे देवे दिवि दीप्यन्ती पृथगिव पूर्णा संविज्जयति ।। ९२७।।


दहरसरोजाद् द्विदलसरोजं द्विदलसरोजाद्दशशतपत्रम् ।

दशशतपत्राद्देहं देहात् सकलं विषयं संविद् व्रजति ।। ९२८ ।।


वह्निज्वाला समिधमिवैषा सकलं देहं संवित्प्राप्ता ।

पृथगिव भूता व्यपगतवीर्या भवति सधूमा संसाराय ।। ९२९ ।।


अत्रानुभवस्सुखदुःखानामत्राहङ्कृतिरनृता भवति ।

अत्रैवेदं सकलं भिन्नं प्रतिभासेत प्रज्ञास्खलने ।। ९३० ।।


दशशतपत्राद् द्विदलसरोजं द्विदलसरोजाद्दहरसरोजम् ।

अवतरतीशा येषामेषा तेषामन्तर्नित्या निष्ठा ।। ९३१।।


अथवा देहादावृत्तस्सन्नन्यतमस्यामासु स्थल्याम् ।

आधारस्थे कुलकुण्डे वा स्थितधीर्नित्यां निष्ठां लभते ।। ९३२ ।।


दशशतपत्रे शक्तिर्ललिता वज्रवती सा द्विदलसरोजे ।

दहराम्बुरुहे भद्रा काली मूलाधारे भैरव्याख्या ।। ९३३।।


खेलति ललिता द्रवति स्थाने छिन्नग्रन्थिनि राजत्यैन्द्री ।

बद्धकवाटे भद्रा काली तपसा ज्वलिते भैरव्याख्या ।। ९३४।।


यद्यपि कालीवज्रेश्वर्यो स्यातां भिन्ने इव पिण्डेषु ।

ओजस्तत्त्वस्यैक्यादण्डे न द्वौ शक्तेर्भेदौ भवतः ।।९३५।।


एवमभेदो यद्यपि कर्मद्वैधात् द्वैधं तत्रापि स्यात् ।

सैव पचन्ती भुवनं काली सैव दहन्ती शत्रूनैन्द्री ।। ९३६ ।।


पिण्डे चाण्डे जङ्गमसारः शुद्धा प्रज्ञा सुन्दर्युक्ता ।

विषयदशायां देशीभूता सेयं भुवनेश्वर्याख्याता ।। ९३७।।.


शून्यप्रख्या या चिल्लीना प्रलये ब्रह्मणि जन्मिषु सुप्तौ ।

कबलितसकलब्रह्माण्डां तां कवयः श्रेष्ठां ज्येष्ठामाहुः ।। ९३८ ।।


निद्राविस्मृतिमोहालस्यप्रविभेदैस्सा भवमग्नेषु ।

एषैव स्याद्युञ्जानेषु ध्वस्तविकल्पः कोऽपि समाधिः ॥ ९३९॥


ऐन्द्री शक्तिर्व्यक्तबला चेद् भिन्ने स्यातां शीर्षकपाले ।

तस्मादेतां चतुरवचस्काः परिभाषन्ते छिन्नशिरस्काम् ॥ ९४० ॥


भवति परा वाग्भैरव्याख्या पश्यन्ती सा कथिता तारा ।

रसनिधिमाप्ता जिह्वारङ्गं मातङ्गीति प्रथिता सेयम् ।। ९४१।।


पिण्डे चाण्डे स्तम्भनशक्तिर्बगला मातस्तव महिमैकः ।

सर्वे व्यक्ताः किरणाः कमला बाह्यो महिमा भुवनाम्ब तव ।।९४२॥


बोधे बोधे बोद्धश्शक्तिं सङ्कल्पानां पश्चाद्भान्तीम् ।

अविमुञ्चन्यो मनुते धीरो यत्किञ्चिद्वा ललिताऽवति तम् ।। ९४३ ।।


दृष्टौ दृष्टौ द्रष्टुश्शक्तिं लोचनमण्डलमध्ये भान्तीम् ।

अविमुञ्चन्यः पश्यति धीरो यत्किञ्चिद्वा तमवत्यैन्द्री ।। ९४४।।


प्राणसमीरं विदधानमिमं नित्यां यात्रामत्र शरीरे ।

चरणे चरणे परिशीलयति स्थिरदृष्टिर्यस्तमवति काली ।। ९४५।।


स्थूलविकारान् परिमुञ्चन्त्या निर्मलनभसि स्थितया दृष्टया ।

मज्जन्त्या वा दहराकाशे लोकेश्वर्याः करुणां लभते ।। ९४६ ।।


सर्वविकल्पान् परिभूयान्तर्विमलं मौनं महदवलम्ब्य ।

केवलमेकस्तिष्ठति योऽन्तस्तं सा ज्येष्ठा कुरुते मुक्तम् ।। ९४७।।


मूले स्थित्या भैरव्याख्यां तारां देवीमुद्गीथेन ।

सेवेतार्यो विदितरहस्यो मातङ्गीं तां गुणगानेन ।।॥ ९४८ ।।.


आसनबन्धादचलो भूत्वा रुद्धप्राणो बगलां भजते ।

अभितो व्याप्तं व्यक्तं तेजः कलयन् कमलाकरुणां लभते ।। ९४९।।


एकविधादौ बहुभेदाऽथो शक्तिरनन्ता परमेशस्य ।

सभजनमार्गं गणपतिमुनिना पादाकुलकैरेवं विवृता ।। ९५०।।

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