काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
पञ्चमः स्तबकः – उपजातिवृत्तम्

“परिणयः” — अर्थात् “दिव्य विवाह” शीर्षक वाला यह पाँचवाँ स्तबक उमा देवी और महेश्वर के पवित्र विवाह का गान करता है। आरम्भिक श्लोकों में देवी की मन्दहासमयी कान्ति और सौन्दर्य का विशेष वर्णन है, और धीरे-धीरे कथा उनके विवाह तथा उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ की ओर बढ़ती है। शिव का उमा के सौन्दर्य का दर्शन, दोनों में परस्पर प्रेम का विकास, तपस्या द्वारा उनके मिलन का मार्ग प्रशस्त होना, और अन्ततः देवताओं, सिद्धों, गणों तथा ऋषियों की उपस्थिति में उनका दिव्य विवाह सम्पन्न होना — इन सबका सुन्दर चित्रण यहाँ मिलता है। इसलिए परिणयः शीर्षक पूर्णतः उपयुक्त है। ये श्लोक केवल एक विवाह-प्रसंग का वर्णन नहीं करते, बल्कि शिव और शक्ति के विश्वात्मक ऐक्य को समस्त पवित्र दाम्पत्य का आदर्श तथा दिव्य सृष्टि और अभिव्यक्ति का मूल आधार प्रस्तुत करते हैं।
सुपरिचित पौराणिक कथा को मुनि अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक दृष्टि से देखते हैं। यह विवाह दो पृथक व्यक्तियों — शिव और उमा — के संयोगमात्र के रूप में नहीं, बल्कि मूलतः अविभाज्य दो तत्त्वों के पुनर्मिलन के रूप में उभरता है। श्लोक-दर-श्लोक यह संकेत गहराता जाता है कि वे एक-दूसरे के बिना पूर्णतः समझे ही नहीं जा सकते — उमा केवल शिव की हैं और शिव केवल उमा के हैं। शिव का उग्र तपस्वी रूप भी यहाँ एक गहरे आध्यात्मिक सत्य का माध्यम बनता है। कपाल, सर्प, भस्म और श्मशानवास जैसे बाहर से भयावह प्रतीत होने वाले लक्षणों के बावजूद उमा का उनसे प्रेम करना यह बताता है कि सच्चा प्रेम बाह्य सौन्दर्य पर आधारित नहीं होता।
यह स्तबक तपस्या और पुरुषार्थ को भी विशेष आध्यात्मिक महत्त्व देता है। मुनि संकेत करते हैं कि जो सम्बन्ध स्वभावतः शाश्वत हो, जो नियत और अन्तर्निहित ही क्यों न हो, उसे भी साधक के जीवन में अनुशासित प्रयास और तपस्या के द्वारा साकार करना पड़ता है। इस प्रकार दिव्य विवाह की कथा साधक के अपने अन्तःजीवन के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण उपदेश बन जाती है।
उपजाति छन्द में मुनि की काव्यप्रतिभा विशेष रूप से दमकती है। भक्ति, सौन्दर्य, हास्य, शृङ्गार, दार्शनिक चिन्तन और पौराणिक आख्यान — ये सभी एक ही स्वाभाविक प्रवाह में मिल जाते हैं। चन्द्रप्रभा, कपूर और देवी के मन्दहास जैसे कोमल बिम्बों से लेकर शिव के कपाल, सर्प, भस्म और श्मशान से जुड़े उग्र चित्रों तक वे बड़ी सहजता से विचरते हैं और ऊपर से विरोधी दिखाई देने वाली वस्तुओं को भी अन्तर्निहित एकता के प्रतीक में बदल देते हैं। पौराणिक कथा को एक साथ सौन्दर्यमय, संकेतसमृद्ध और परतत्त्वबोधक बना देना उनकी काव्यशक्ति की एक महान विशेषता है।
अन्तिम श्लोक में मुनि इन रचनाओं को सन्दर्भशुद्धा उपजातयः — अर्थात् प्रसंग के अनुरूप और सुगढ़ रूप से रचित उपजाति श्लोक — कहते हैं। जगन्माता के मंगलमय दिव्य विवाह का वर्णन करते हुए और सज्जनों के आनन्द के लिए समर्पित ये श्लोक भक्ति, शृङ्गार-सौन्दर्य, पुराण और परतत्त्व का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करने वाली उत्कृष्ट काव्यसम्पदा के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।
द्वितीयं शतकम्
पञ्चमः स्तबकः – उपजातिवृत्तम्
परिणयः
श्रीखण्डचर्चामिव कल्पयन्त्यो मुहुः कपोलेषु सखीजनस्य ।
श्रीकण्ठकान्ताहसिताङ्कुराणां श्रीमन्ति कुर्वन्तु जगन्ति भासः ।। १०१ ।।
कीर्तिर्वलक्षा कुसुमायुधस्य स्वर्णाद्रिकोदण्डजयोन्नतस्य ।
दरस्मितश्रीर्द्विरदास्यमातुर्द्राघीयसीं वो वितनोतु भूतिम् ।। १०२ ।।
प्रमथ्यमानामृतराशिवीचिप्रोद्गच्छदच्छाच्छतुषारकल्पाः ।
युष्माकमिच्छां विदधत्वमोघां विघ्नेशमातुर्दरहासलेशाः ।। १०३।।
चन्द्रातपः कश्चन सम्प्रसन्नो महेशनेत्रातिथितर्पणो नः ।
मनोभिलाषं सफलीकरोतु महेश्वरीहासलवप्रकाशः ।।१०४।।
वलक्षवक्षोजपटाञ्चलेन चलेन सार्धं कृतकेलयो नः ।
पुरत्रयारातिकलत्रहास भासो निरासं विपदां क्रियासुः ।। १०५।।
भूयासुरायासहराणि तानि स्मितानि भूतेशमृगीदृशो नः ।
येषां त्विषो बिभ्रति दिग्वधूटीगण्डेषु कर्पूरपरागलीलाम् ।। १०६ ।।
कुर्वन्तु कामं सफलं मदीयं कुलाद्रिकन्याहसितानि तानि ।
येषां मयूखैः क्रियते सिताद्रेरुद्यानवाटीषु नवो वसन्तः ।। १०७ ।।
आम्रेडितं भूषणचन्द्रभासां नासाविभूषामहसां द्विरुक्तिः ।
पुरारिनारीस्मितकान्तयो मे पूर्णानि कुर्वन्तु समीहितानि ।। १०८ ।।
निर्माय विश्वालयमम्ब शर्वस्त्वया समं शिल्पविदा स शिल्पी ।
विहर्तुमिच्छन्नयि वोढुमैच्छनारीं भवन्तीं पुरुषो भवंस्त्वाम् ।। १०९ ।।
दिव्यं दुकूलं धवलं दधाना वेण्या फणीन्द्रोपमया लसन्ती।
प्रफुल्लराजीवविलोचना त्वं प्रपञ्चभर्तुर्नयनान्यहार्षीः ।। ११० ।।
प्रत्यङ्गबन्धं ज्वलदुत्तमं ते भुजङ्गराजोपमवेणिरूपम् ।
आत्मैकनिष्ठस्य च विश्वभर्तुराराधयामास विलोचनानि ।। १११।।
अभूस्त्वमाद्यस्य मनोमदाय स चापि ते प्रीतिपदं बभूव ।
न केवलं वां सकलस्य चासीद्दाम्पत्यबन्धस्य तदम्ब बीजम् ।। ११२ ।।
तवातिकान्ता नयनान्तवृत्तिर्हासः पुरारेश्च नवेन्दुहारी ।
उभौ विवाहोत्सवपूर्वरङ्गं निर्वर्तयामासतुरादिरामे ।। ११३।।
दातुं प्रभुः सान्त्वयितुं समर्थः कर्तुं क्षमस्तर्जयितुं च शक्तः।
संरक्षतान्मां तव सर्ववन्द्ये करस्तुषारांशुभृता गृहीतः ।। ११४ ।।
स्प्रष्टुं न शक्या परमे परैस्त्वं स चान्यया चिन्तयितुं न शक्यः ।
त्वमेव शर्वस्य स एव तेऽम्ब दाम्पत्यमेवं युवयोस्तु सत्यम् ।। ११५।।
निजाद्वतंसेन्दुत इन्दुमन्यमुत्पाद्य ते शम्भुरदाद्वतंसम् ।
मूर्तामिवासौ शुभगात्रि रात्रिं प्राप्य त्वदीयां कबरीं चकासे ।। ११६ ।।
बभूविथागेन्द्रगृहे यदा त्वं स चेश्वरस्तत्र चकार वासम् ।
विलोकमानस्तव देवि विद्युत् पाञ्चालिकायाः कमनीयभावम् ।। ११७ ।।
सिद्धं स वां साधयितुं प्रवृत्तो योगं प्रदग्धो मदनश्च कल्पे ।
वशीति कीर्तिं गिरिशस्य भर्तुं तुभ्यं त्वपर्णेति यशश्च कर्तुम् ।। ११८ ।।
घोरं तपश्चद्रचितं त्वयाऽपि प्राग्रूपभर्तुः समनुग्रहाय ।
विहाय यत्नं क इहाखिलाऽम्ब सम्बद्धमप्यर्थमुपैतु जन्तुः ।। ११९।।
ज्वलत्कपर्दो दहनाङ्कभालः कपालमाली करिकृत्तिवासाः ।
भुजङ्गभूषो भसिताङ्गरागः पुष्पेषु वैरी परुषाट्टहासः ।। १२० ।।
श्मशानवासी पुरुषस्त्रिशूली जहार ते चेदनघाङ्गि चेतः ।
दृष्टान्तमर्थोऽयमवाप नैव प्रीतिर्बहिःकारणमाश्रितेति ।। १२१।।
रूपं पुरारेरथवा तदेतत् सेयं च चेष्टा समयान्तरेषु ।
कान्तं वपुः कान्ततराश्च लीलास्त्वया समं खेलितुमेष धत्ते ।। १२२।।
प्रहृष्टयक्षः समवेतसिद्धो नृत्यद्गणेन्द्रो विकसन्मुनीन्द्रः ।
भूयोऽपि योगो युवयोर्हिमाद्रौ बभार मातर्महमद्वितीयम् ।। १२३ ।।
महेश्वरस्त्वां परिणीय लेभे यावात्मजौ द्वावनघाङ्गि मुख्यौ ।
एकस्तयोर्भाम्यति विश्वमत्तुं भूभृत्तटीराश्रयते बतान्यः ।। १२४।।
सङ्कीर्तयन्त्यो जगतां जनन्याः कल्याणवार्ताः कमनीयकीर्तेः ।
इमाः प्रमोदाय सतां भवन्तु सन्दर्भशुद्धा उपजातयो नः ।। १२५।।
