काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
षष्ठः स्तबकः - मदलेखावृत्तम्

“माहाभाग्यम्” — अर्थात् “देवी का परम वैभव और महान सौभाग्य” शीर्षक वाला यह छठा स्तबक समस्त विश्वशक्तियों की मूलस्वरूपा उमा देवी की अपरिमित महिमा का गान करता है। श्री गणपति मुनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ही उनकी लीला-भूमि के रूप में चित्रित करते हैं: आकाश उनका विहारवन और निवास है; पृथ्वी उनकी भोजनशाला है; और समस्त लोक उनके हाथों में मानो क्रीड़ा-वस्तुओं के समान हैं। देवताओं, मनुष्यों और सभी प्राणियों को बुद्धि, सिद्धि, बल, गति, स्थिरता, प्रकाश, ऊष्मा, तेज, द्रवता तथा असंख्य प्रकार की सामर्थ्य प्रदान करने वाली वही हैं। इसलिए माहाभाग्यम् शीर्षक इस स्तबक के लिए अत्यन्त उपयुक्त है, क्योंकि पूरे स्तबक में दिव्यमाता का असीम वैभव, सार्वभौम प्रभुत्व और अक्षय शक्तिसम्पदा विविध रूपों में प्रकट होती है।
इस स्तबक के सबसे आकर्षक भावों में से एक है अनन्त विश्वशक्ति और अत्यन्त कोमल स्त्री-सौन्दर्य के बीच दिखाई देने वाला अद्भुत विरोध-सामंजस्य। ब्रह्माण्डों का संचालन करने वाली वही देवी एक सुकोमल, तन्वी, मधुरभाषिणी, नाजुक अंगों और भावपूर्ण नेत्रों वाली सौम्य स्त्रीरूपिणी के रूप में प्रकट होती हैं। मुनि इस विलक्षण विरोधाभास को बार-बार अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से उभारते हैं। उनकी भौंहों का किंचित् स्पन्दन ही जीवों को भयभीत कर सकता है और नक्षत्रमण्डलों तक को कम्पित कर सकता है।
उनके संकल्प से तृण से भी अग्नि उत्पन्न हो सकती है और प्रचण्ड अग्नि भी शीतल हो सकती है। शिव परम साक्षी के रूप में स्थित रहते हैं, जबकि सृष्टि, स्थिति और लय के कार्यों को प्रत्यक्ष रूप से सम्पन्न करने वाली वही शक्ति हैं। इस प्रकार ये श्लोक स्पष्ट करते हैं कि शक्ति केवल ईश्वर का कोई एक गुण मात्र नहीं, बल्कि समस्त जगद्व्यवहार को साकार करने वाली सक्रिय दिव्य सामर्थ्य है।
संक्षिप्त और संगीतात्मक मदलेखा छन्द में मुनि की काव्यप्रतिभा विशेष रूप से उजागर होती है। तीव्र गति वाले समानान्तर वाक्य-विन्यास, सुन्दर विरोधी बिम्ब और सहज स्मरणीय रूपकों के माध्यम से वे अत्यन्त व्यापक दार्शनिक और देवतत्त्व सम्बन्धी विचारों को बहुत कम शब्दों में व्यक्त कर देते हैं। तन्त्र, शाक्ततत्त्व और काव्यशास्त्रीय सौन्दर्य पर उनकी गहरी पकड़ के कारण वे विश्व-सृष्टि के गम्भीर सिद्धान्तों से आत्मीय भक्ति तक, और परतत्त्व के गहन निरूपणों से देवी के चमत्कारपूर्ण, कोमल सौन्दर्य-वर्णनों तक अत्यन्त सहजता से प्रवाहित होते हैं।
अन्तिम श्लोक में हेरम्बभक्त द्वारा रचित इन सुगन्धित मदलेखा श्लोकों को दिव्यमाता की प्रसन्नता के लिए समर्पित किया गया है। महिमा, माधुर्य, तात्त्विक गाम्भीर्य और ललित काव्य-सौन्दर्य — इन चारों का एक साथ समन्वय करने वाले इस स्तबक के लिए यह अत्यन्त सुन्दर और सार्थक समापन है।
षष्ठः स्तबकः - मदलेखावृत्तम्
माहाभाग्यम्
हर्तारः शशिकीर्तेः कर्तारो नवभासाम् ।
भर्तारो मम सन्तु स्कन्दाम्बादरहासाः ।। १२६।।
दिग्वल्लीष्वतिशुभ्रां कुर्वन्तः कुसुमर्द्धिम् ।
भूयासुस्तव भूत्यै मन्मातुः स्मितलेशाः ।। १२७ ।।
एकश्चेत्तव शक्तो ब्रह्माण्डस्य भवाय ।
भर्गप्रेयसि हासः किं स्तोत्रं तव भूयः ।। १२८ ।।
उद्याने वियदाख्ये कालि त्वां विहरन्तीम् ।
गोलैः कन्दुककल्पैरल्पा वाक्किमु माति ।। १२९।।
खं क्रीडाभवनं ते कः कार्यालय एषः ।
पृथ्वीयं बहुलान्ना मातर्भोजनशाला ।। १३०।।
बुद्धीनामसि दात्री सिद्धीनामसि नेत्री ।
वीर्याणामसि पेटी कार्याणामसि धाटी ।। १३१ ।।
विद्यानामसि भावो हृद्यानामसि हावः ।
देवानामसि लीला दैत्यानामसि हेला ।। १३२।।
गन्तृणामसि चेष्टा स्थाणूनामसि निष्ठा ।
लोकानामसि मूलं लोकादेरसि जालम् ।।१३३।।
देवी व्यापकतेजः शक्तिस्तत्त्वविचारे ।
अत्यन्तं सुकुमारी नारी मूर्तिविचारे ।। १३४ ।।
क्व ज्योतिर्महतोऽस्मादाकाशादपि भूयः ।
तत्सर्वं विनयन्ती तन्वङ्गी क्व नु नारी ।। १३५।।
देवेन्द्राय विभुत्वं सूर्यायोस्रसहस्रम् ।
ऊष्माणं दहनाय ज्योत्स्नामोषधिराजे ।। १३६।।
वातायामितवी र्यं विस्तारं गगनाय ।
सान्द्रत्वं वसुधायै तोयाय द्रवभावम् ।। १३७।।
माहाभाग्यमपारं कोटिभ्यो विबुधानाम् ।
चित्राः काश्चन सिद्धीर्लक्षेभ्यो मनुजानाम् ।। १३८ ।।
स्थाणुभ्यो धृतिशक्तिं गन्तृभ्यो गतिशक्तिम् ।
कस्माच्चिन्निजकोशादेका देवि ददाना ।। १३९ ।।
आश्चर्यं विदधाना सर्वं वस्तु दधाना ।
हन्त त्वं मम मातः काचित्कोमलगात्री ।।१४०।।
श्रोणीभारनतायां कस्याञ्चित्तनुगात्र्याम् ।
ईदृक्षा यदि शक्तिः कावेतो ननु माया ।। १४१।।
रूपं ते तनुगात्रं वाणी ते मृदुनादा ।
चापं ते मधुरेक्षुः पाणिस्ते सुकुमारः ।। १४२।।
लोले लोचनयुग्मे भीरुत्वं प्रकटं ते ।
ब्रह्माण्डं त्वदधीनं श्रद्धत्तामिह को वा ।। १४३।।
भ्रूभङ्गं कुरुषे चेन्मुग्धे गौरि मुखाब्जे ।
भूतान्यप्ययि बिभ्यत्येजेरन्नपि ताराः ।।१४४।।
शुद्धान्तेश्वरि शम्भोरिच्छा चेत्तव काऽपि ।
घोरोऽग्निस्तृणगर्भाद्घोराग्नेरपि शैत्यम् ।। १४५।।
द्रष्टुं विश्वमपारं भारस्ते दयितस्य ।
कर्तुं कार्यमशेषं श्रीमातस्तव भारः ।। १४६।।
साक्षी केवलमीशः कर्तुं भर्तुमुताहो ।
हर्तुं वाऽखिलमम्ब त्वं साक्षाद्धृतदीक्षा ।। १४७।।
कारङ्कारमुमे यद् ब्रह्माण्डानि निहंसि ।
तन्मन्ये सुरमान्ये बालैवाऽम्ब सदा त्वम् ।। १४८ ।।
लीलोज्जीवितकामे रामे शङ्करसक्ते ।
त्वत्पादार्चनसक्तं भक्तं मां कुरु शक्तम् ।। १४९।।
एताः पावनगन्धाः सर्वेशप्रमदे ते ।
हैरम्ब्यो मदलेखाः सन्तोषाय भवन्तु ।। १५०।।
