काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
सप्तमः स्तबकः - वसन्ततिलकावृत्तम्

“व्योमशरीरा, मातृकादि विभूतयश्च” — अर्थात् “आकाश को ही शरीर के रूप में धारण करने वाली देवी और मातृका आदि रूपों में उनकी दिव्य अभिव्यक्तियाँ” शीर्षक वाला यह सातवाँ स्तबक उमा देवी के स्वरूप को विश्वरूपिणी और असंख्य शक्तिरूपों के समन्वित स्वरूप के रूप में विस्तार से प्रस्तुत करता है। मुनि आरम्भ में उन्हें नाद, वाक्, ज्योति और अविभाज्य चेतना के साथ अभिन्न बताते हैं और घोषित करते हैं कि तीनों लोकों में कार्यरत असंख्य शक्तियाँ उन्हीं में समाहित हैं। उनका वास्तविक शरीर केवल मानवरूप दिव्य मूर्ति तक सीमित नहीं है; सम्पूर्ण अन्तरिक्ष ही उनका सूक्ष्म और विराट् शरीर है। असंख्य सूर्य, चन्द्र, लोक, इन्द्रियाँ, प्राण और समस्त गतियाँ जिस असीम विश्वक्षेत्र में उत्पन्न होती, विस्तार पाती और कार्य करती हैं, उसी को जगन्माता के जीवित दिव्य शरीर के रूप में देखा गया है। इस प्रकार व्योमशरीरा शीर्षक का पहला भाग सम्पूर्ण विश्वाकाश को ही देवी का शरीर मानकर पूर्णतः सार्थक हो जाता है।
शीर्षक का दूसरा भाग देवी की विशिष्ट दैवी शक्तियों और अभिव्यक्तियों का अद्भुत निरूपण करके पूर्ण होता है। वही एक पराशक्ति शब्द और वाणी में ब्राह्मी के रूप में; रूपों के आविर्भाव और उनकी सुव्यवस्था में वैष्णवी के रूप में; व्यक्तिगत चेतना में माहेश्वरी के रूप में; शुद्ध आन्तरिक चेतना में गुरुगुह से सम्बन्धित शक्ति के रूप में; जीवों द्वारा अन्न को ग्रहण करने, पचाने और आत्मसात् करने की शक्ति में वाराही के रूप में; विरोधी शक्तियों के विनाश में इन्द्रशक्ति के रूप में; और रक्षा, संहार तथा रूपान्तरण जैसे उग्र कार्यों में चामुण्डा, काली और कौशिकी के रूप में प्रकट होती हैं। इसके अतिरिक्त मुनि उन्हें मूलमाया, जालमाया, योगमाया और पाशमाया जैसे भिन्न रूपों में भी विवेचित करते हैं, तथा चेतना जिस स्तर पर कार्य करती है उसके अनुसार विभिन्न निद्रा अवस्थाओं में भी उनकी अभिव्यक्ति को समझाते हैं। इस प्रकार यह स्तबक एक व्यापक शाक्तदृष्टि प्रस्तुत करता है, जिसमें समस्त देवीरूप, विश्वगत क्रियाएँ, मानसिक अवस्थाएँ और आध्यात्मिक शक्तियाँ एक ही महाशक्ति की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।
इस स्तबक में मुनि का पाण्डित्य और काव्यकौशल और अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। वैदिक पारिभाषिक शब्दावली, तन्त्र, देवी-उपासना की परम्पराएँ, योग, विश्वतत्त्व और सूक्ष्म मनोविज्ञान — इन सबको वे एक ही समन्वित दृष्टि में जोड़ते हैं, फिर भी स्तोत्र का भक्ति-केंद्र कहीं भी ओझल नहीं होता। एक ओर अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक विचार सामने आते हैं, तो दूसरी ओर काली, चामुण्डा और कौशिकी जैसे सजीव दिव्यरूप प्रकट होते हैं। असीम विश्वाकाश को जीवों की इन्द्रियों, प्राण और चेतना से घनिष्ठ रूप से जोड़ देना इस स्तबक की एक विशेष उपलब्धि है।
सुन्दर वसन्ततिलका छन्द इस गहन देवतत्त्व को अद्भुत ललित प्रवाह प्रदान करता है। स्तबक अन्ततः केवल निराकार दार्शनिक चिन्तन पर समाप्त नहीं होता, बल्कि व्यक्तिगत शरणागति में अपनी पूर्णता प्राप्त करता है। मुनि अपने परिवारजनों और सहचरों सहित जगन्माता के चरणों में शरण माँगते हैं। इसलिए यह स्तबक एक साथ शक्तितत्त्व का समन्वित दर्शन, देवी की अनन्त विभूतियों की स्तुति और हृदय से निकली व्यक्तिगत प्रार्थना बन जाता है।
सप्तमः स्तबकः - वसन्ततिलकावृत्तम्
व्योमशरीरा, मातृकादिविभूतयश्च
वाणीसरोरुहदृशो हयराजहंसो
वक्त्रारविन्दनिलयाद्वहिरागतायाः ।
आलापकालदरहास इह स्थितानां
क्षेमं करोतु सुतरां हरसुन्दरी यः ।। १५१।।
नादोऽसि वागसि विभाऽसि चिदस्यखण्डा
खण्डीभवन्त्यपि चिदस्यखिलेन्द्रकान्ते ।
तत्तादृशीं निखिलशक्तिसमष्टिमीशे
त्वामन्तरिक्षपरिकॢप्ततनुं नमामि ।। १५२।।
विश्वप्रसिद्धविभवास्त्रिषु विष्टपेषु
याः शक्तयः प्रविलसन्ति परःसहस्राः ।
तासां समष्टिरतिचित्रनिधानदृष्टिः
सृ ष्टिस्थितिप्रलयकृद् भुवनेश्वरि त्वम् ।। १५३ ।।
जाने न यत्तव जगज्जनयित्रि रूपं
सङ्कल्प्यते किमपि तन्मनसो बलेन ।
सङ्कल्पितस्य वपुषः श्रितशोकहन्त्रि
विन्यस्यते तव वचोतिगधाम नाम ।। १५४।।
कामं वदन्तु वनितामितिहासदक्षा
स्त्वां सर्वलोकजनयित्रि सदेहबन्धाम् ।
सत्यं च तद्भवतु सा तव काऽपि लीला
दिव्यं रजस्तु तव वास्तविकं शरीरम् ।। १५५।।
भूजन्मपांसुभिरगर्हितशुद्धरूपा
या काऽपि पांसुपटली विपुलेऽन्तरिक्षे ।
सा ते तनुः सुमहती वरदे सुसूक्ष्मा
तामेव देवसरणिं कथयन्ति धीराः ।। १५६ ।।
या देवि देवसरणिर्भवमग्नदुर्गा
वैरोचनीति कथिता तपसा ज्वलन्ती ।
राजीवबन्धुमहसा विहिताङ्गरागा
सा ते तनुर्भवति सर्वसुपर्ववर्ये ।। १५७ ।।
प्राणास्तवात्र हृदयं च विराजतेऽत्र
नेत्राणि चात्र शतशः श्रवणानि चात्र ।
घ्राणानि चात्र रसनानि तथा त्वचश्च
वाचोऽत्र देवि चरणानि च पाणयोऽत्र ।। १५८ ।।
सर्वत्र पश्यसि शृणोषि च सर्वतोऽम्ब
सर्वत्र खादसि विजिघ्रसि सर्वतोऽपि ।
सर्वत्र च स्पृशसि मातरभिन्नकाले
कः शक्नुयान्निगदितुं तव देवि भाग्यम् ।। १५९ ।।
सर्वत्र नन्दसि विमुञ्चसि सर्वतोऽम्ब
सर्वत्र संसरसि गर्जसि सर्वतोऽपि ।
सर्वत्र देवि कुरुषे तव कर्मजाल
वैचित्र्यमीश्वरि निरूपयितुं क्षमः कः ।। १६०।।
विश्वाम्बिके त्वयि रुचां पतयः कियन्तो
नानाविधाब्धिकलिताः क्षितयः कियत्यः ।
बिम्बानि शीतमहसां लसतां कियन्ति
नैतच्च वेद यदि को विबुधो बहुज्ञः ।। १६१।।
अव्यक्तशब्दकलयाऽखिलमन्तरिक्षं
त्वं व्याप्य देवि सकलागमसम्प्रगीते ।
नादोऽस्युपाधिवशतोऽथ वचांसि चासि
ब्राह्मीं वदन्ति कवयोऽमुकवैभवां त्वाम् ।। १६२।।
नानाविधैर्भुवनजालसवित्रि रूपै-
र्व्याप्तैक निष्कलगभीरमहस्तरङ्गैः ।
व्यक् तं विचित्रयसि सर्वमखर्वशक्ते
सा वैष्णवी तव कला कथिता मुनीन्द्रैः ।। १६३ ।।
व्यक्तित्वमम्ब हृदये हृदये दधासि
येन प्रभिन्न इव बद्ध इवान्तरात्मा ।
सेयं कला भुवननाटकसूत्रभर्त्रि
माहेश्वरीति कथिता तव चिद्विभूतिः ।। १६४।।
आहारशुद्धिवशतः परिशुद्धसत्त्वे
नित्यस्थिरस्मृतिधरे विकसत्सरोजे ।
प्रादुर्भवस्यमलतत्त्वविभासिका या
सा त्वं स्मृता गुरुगुहस्य सवित्रि शक्तिः ।। १६५।।
हव्यं यया दिविषदो मधुरं लभन्ते
कव्यं यया रुचिकरं पितरो भजन्ते ।
अश्नाति चान्नमखिलोऽपि जनो ययैव
सा ते वराहवदनेति कलाऽम्ब गीता ।। १६६ ।।
दुष्टान्निहंसि जगतामवनाय साक्षा
दन्यैश्च घातयसि तप्तबलैर्महद्भिः ।
दम्भोलिचेष्टितपरीक्ष्यबला बलारेः
शक्तिर्न्यगादि तव देवि विभूतिरेषा ।। १६७ ।।
सङ्कल्परक्तकणपानविवृद्धशक्त्या
जाग्रत्समाधिकलयेश्वरि ते विभूत्या ।
मूलाग्निचण्डशशिमुण्डतनुत्रभेत्र्या
चामुण्डया तनुषु देवि न किं कृतं स्यात् ।। १६८ ।।
त्वं लोकराज्ञि परमात्मनि मूलमाया
शक्रे समस्तसुरभर्तरि जालमाया ।
छायेश्वरान्तरपुमात्मनि योगमाया
संसारसक्तहृदयेष्वसि पाशमाया ।। १६९।।
त्वं भूतभर्तरि भवस्यनुभूतिनिद्रा
सोमस्य पातरि बिडौजसि मोदनिद्रा।
सप्ताश्वबिम्बपुरुषात्मनि योगनिद्रा
संसारमग्नहृदयेष्वसि मोहनिद्रा ।। १७० ।।
विष्णुश्चकार मधुकैटभनाशनं य-
न्मुक्तः सहस्रदलसम्भवसंस्तुता सा ।
काली घनाञ्जननिभप्रभदेहशालि-
न्युग्रा तवाम्ब भुवनेश्वरि कोऽपि भागः ।। १७१।।
विद्युत्प्रभामयमधृष्यतमं द्विषद्भि-
श्चण्डप्रचण्डमखिलक्षयकार्यशक्तम् ।
यत्ते सवित्रि महिषस्य वधे स्वरूपं
तच्चिन्तनादिह नरस्य न पापभीतिः ।। १७२।।
शुम्भं निशुम्भमपि या जगदेकवीरौ
शूलाग्रशान्तमहसौ महती चकार ।
सा कौशिकी भवति काशयशाः कृशोद-
र्यात्माङ्गजा तव महेश्वरि कश्चिदंशः ।। १७३।।
माये शिवे श्रितविपद्विनिहन्त्रि मातः
पश्य प्रसादभरशीतलया दृशा माम् ।
एषोऽहमात्मजकलत्रसुहृत्समेतो
देवि त्वदीयचरणं शरणं गतोऽस्मि ।। १७४ ।।
धिन्वन्तु कोमलपदाः शिववल्लभाया-
श्चेतो वसन्ततिलकाः कविक ुञ्जरस्य ।
आनन्दयन्तु च पदाश्रितसाधुसङ्घं
कष्टं विधूय सकलं च विधाय चेष्टम् ।। १७५।।
