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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

अष्टमः स्तबकः - अनुष्टुब्वृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“चरित्रत्रयम्” — अर्थात् “तीन दिव्य चरित्र” शीर्षक वाला यह आठवाँ स्तबक परम्परागत रूप से महाकाली, महालक्ष्मी/चण्डिका और कौशिकी-महासरस्वती से सम्बद्ध दिव्यमाता की तीन महान अवतार-लीलाओं का गान करता है। मधु-कैटभ का संहार, महाबली महिषासुर का वध, और उसके बाद शुम्भ, निशुम्भ तथा उनकी सेनाओं का विनाश — देवी के ये तीन प्रमुख चरित्र इस स्तबक में संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत होते हैं। इसलिए चरित्रत्रयम् शीर्षक सीधे और पूर्ण रूप से सार्थक है। केवल पच्चीस श्लोकों में मुनि देवी के इन तीन महान चरित्रों का सार समाहित करते हुए यह प्रतिपादित करते हैं कि जब-जब जगत् की धर्मव्यवस्था बाधित होती है, तब भिन्न-भिन्न रूप धारण करके प्रकट होने वाली परमशक्ति वस्तुतः एक ही उमा देवी हैं।


इस स्तबक में मुनि की वर्णन-शैली अपनी नाटकीय शक्ति के कारण विशेष रूप से प्रभावित करती है। वे युद्धकथाओं को केवल दोहराते नहीं, बल्कि पहले शत्रुओं की प्रचण्ड शक्ति और उनकी भयावहता का प्रभावशाली चित्र खींचते हैं। देवताओं और विश्व का संचालन करने वाली दैवी शक्तियों को भी उनके सामने असहाय दिखाकर, आगे देवी की विजय को और अधिक विलक्षण एवं महिमामयी बना देते हैं। साथ ही उग्र युद्ध-वर्णन के समानान्तर देवी के अनुपम सौन्दर्य, तेज, करुणा और महिमा का भी चित्रण करते हैं, जिससे वीरता और माधुर्य का सुन्दर संतुलन बनता है।


विश्व को आच्छादित करने वाली योगनिद्रारूपिणी महाकाली, देवताओं के सामूहिक तेज से प्रकट हुई चण्डिका, संग्राम में चामुण्डा और शिवदूती, तथा शुम्भ-निशुम्भ का संहार करने वाली कौशिकी — इन सबको एक ही उमा देवी की विविध दिव्य अभिव्यक्तियों के रूप में देखा गया है। अन्त में यशोदा के यहाँ जन्म लेने वाली और विन्ध्य पर्वत-प्रदेश में विराजमान नन्दा देवी का उल्लेख करके मुनि विभिन्न देवी-परम्पराओं को एक ही शक्तितत्त्व की दृष्टि में समन्वित करते हैं। इससे उनकी व्यापक और एकात्म शाक्त-दृष्टि और भी स्पष्ट हो जाती है।


यह स्तबक श्री गणपति मुनि की पुराण-परम्परा, देवीमाहात्म्य की परम्परा, वीररस-वर्णन, संक्षिप्त कथन-कौशल और काव्यचातुर्य पर उनकी असाधारण पकड़ को स्पष्ट रूप से दिखाता है। सरल किन्तु प्रभावशाली अनुष्टुभ् छन्द में वे विशाल पौराणिक घटनाओं को कुछ ही स्मरणीय दृश्यों में समेट देते हैं। देवताओं की असहायता और देवी की अजेय शक्ति को उभारने के लिए वे व्यंग्य, उपमा और अतिशयोक्ति जैसे काव्य-साधनों का भी प्रभावी उपयोग करते हैं।


अन्ततः इस स्तबक का मुख्य संदेश यह है कि देवी की रक्षणशक्ति, संहारशक्ति और विमोचनशक्ति — ये सभी जगन्माता उमा देवी की एक ही परमशक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार वीररस से परिपूर्ण होते हुए भी भीतर से गहन भक्ति में डूबा यह स्तबक द्वितीय शतक का अत्यन्त शक्तिशाली और प्रभावपूर्ण समापन बन जाता है।


अष्टमः स्तबकः - अनुष्टुब्वृत्तम्

चरित्रत्रयम्


तमसामभितो हन्ता चण्डिकाहासवासरः ।

सतां हृदयराजीवविकासाय प्रकल्पताम् ।। १७६।।


या निद्रा सर्वभूतानां योगनिद्रा रमापतेः ।

ईड्यतां सा महाकाली महाकालसखी सखे ।। १७७ ।।


विरिञ्चिना स्तुते मातः कालि त्वं चेन्न मुञ्चसि ।

मधुकैटभसंहारं करोतु कथमच्युतः ।। १७८।।


वासवः काशनीकाशयशोलङ्कृतदिङ्मुखः ।

महोग्रविक्रमाद्यस्मादासीदाजौ पराङ्मुखः ।। १७९ ।।


यत्प्रतापेन सन्तप्तो मन्ये बाडबरूपभृत् ।

भगवाननलोऽद्यापि सिन्धुवासं न मुञ्चति ।। १८० ।।


कुर्वाणे भूतकदनं यस्मिन्विस्मितचेतसः ।

एष एवान्तको नाहमित्यासीदन्तकस्य धीः ।। १८१।।


रणे येनातिरस्कृत्य त्यक्तो राक्षस इत्यतः ।

चिराय हरिदीशेषु कोणेशः प्राप्तवान्यशः ।। १८२।।


यन्नियन्तुमशक्तस्य कुर्वाणमसतीः क्रियाः ।

नियन्तुरसतामासीत्पाशिनो मलिनं यशः ।। १८३॥


बाहुवीर्यपराभूतो यस्य प्रायेण मारुतः ।

बभूव क्षणदान्तेषु रतान्तपरिचारकः ।। १८४।।


निधीन्येन जितो हित्वा राजराजः पलायितः ।

स्पष्टं बभाण माधुर्यं प्राणानामखिलादपि ।। १८५।।


यस्मिन्नुत्तरपूर्वस्या दिश एकादशाधिपाः ।

कुण्ठा बभूवुरात्मीयकण्ठोपमितकीर्तयः ।। १८६।।


निजशुद्धान्तकान्तानामाननैरेव निर्जितम् ।

ललज्जे यः पुनर्जित्वा शूरमानी सुधाकरम् ।। १८७।।


बालस्येव क्रीडनकैः प्रवीरैर्यस्य खेलतः ।

लीलाकन्दुकधीरासीद्देवे दीधितिमालिनि ।। १८८।।


त्रियामाचरशुद्धान्तभ्रूविलासनिवारणम् ।

विष्णोः सुदर्शनं चक्रं यस्य नापश्यदन्तरम् ।। १८९ ।।


महिषं तं महावीर्यं या सर्वसुरदेहजा ।

अवधीद्दानवं तस्यै चण्डिकायै नमो नमः ।। १९० ।।


मुखं तवासेचनकं ध्यायं ध्यायं निरन्तरम् ।

मृगेन्द्रवाहे कालेन मृडस्त्वन्मुखतां गतः ।। १९१।।


कार्त्तिकीचन्द्रवदना कालिन्दीवीचिदोर्लता ।

अरुणाम्भोजचरणा जयति त्रिरुचिः शिवा ।। १९२ ।।


यत्ते कचभरः कालो यद्बाहुर्लोकरक्षकः ।

युक्तं द्वयं शिवे मध्यस्त्वसन्नाको न नाकराट् ।। १९३ ।।


स्वदेहादेव या देवी प्रदीपादिव दीपिका ।

आविर्बभूव देवानां स्तुवतां हर्तुमापदः ।। १९४।।


धैर्यचातुर्यगाम्भीर्यवीर्यसौन्दर्यशालिनीम् ।

रत्नं नितम्बिनीजातौ मेनिरे यां सुरासुराः ।। १९५।।


यदीयहुङ्कृत्यनले धूम्राक्षोऽभवदाहुतिः ।

समाप्तिं भीषणं यावन्नैवावाप विकत्थनम् ।। १९६ ।।


चामुण्डाशिवदूत्यौ यत् कले दारुणविक्रमे ।

भक्षयामासतुर्मूर्तीः कीर्तिभिः सह रक्षसाम् ।। १९७ ।।


यस्याः शूले जगामास्तं यशः शुम्भनिशुम्भयोः ।

नमामि विमलश्लोकां कौशिकीं नाम तामुमाम् ।। १९८ ।।


यशोदागर्भजननाद् यशोदां गोकुलस्य ताम् ।

वन्दे भगवतीं नन्दां विन्ध्याचलनिवासिनीम् ।। १९९ ।।


अम्बिकामुपतिष्ठन्तामेताश्चण्डीमनुष्टुभः ।

प्रसन्नाः साध्वलङ्काराः सिद्धपद्मेक्षणा इव ।। २००।।


।। समाप्तं च द्वितीयं शतकम् ।।

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