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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

नवमः स्तबकः - आर्यावृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“मन्दहासः” — अर्थात् “कोमल मन्द मुस्कान” शीर्षक वाला यह नवम स्तबक उमा देवी की सुकुमार मुस्कान का निरन्तर गान करने वाली एक अनुपम काव्यमाला है। लगभग प्रत्येक श्लोक उसी एक दिव्य छवि को नए दृष्टिकोण से उद्घाटित करता है। देवी का मन्दहास कहीं शरद्-ऋतु की चन्द्रिका के समान, कहीं अन्तरानन्द-सागर में उठती तरंग के समान, कहीं अन्धकार और दुःख को दूर करने वाली शक्ति के रूप में, तो कहीं मंगल, जागरण, पूर्णता और मन की निर्मलता के स्रोत के रूप में चित्रित होता है। इसलिए मन्दहासः शीर्षक इस स्तबक के लिए पूर्णतः सार्थक है। उमा देवी की कोमल मुस्कान को यह स्तबक अनुग्रह, ज्ञानप्रकाश, आनन्द और करुणाशक्ति के अनेक आध्यात्मिक आयामों का प्रतीक बना देता है।


इस स्तबक में मुनि की काव्यकल्पना विशेष रूप से प्रस्फुटित होती है। वे देवी की मुस्कान की तुलना शरद्-चन्द्रिका, मोतियों की आभा, मल्लिका-पुष्पों की धवलता, अमृत-बुद्बुदों, खेलते हुए बालक और यौवन के दूत से करते हैं। इतना ही नहीं, उस मन्दहास को ऐसी सूक्ष्म शक्ति के रूप में भी चित्रित किया गया है जो स्वयं कामदेव के लिए भी दुर्जेय शिवहृदय को जीत सकती है। अन्धकार, अज्ञान, शोक और अन्तरंग व्यथा जैसे भावों की पुनरावृत्ति यह स्पष्ट करती है कि यह मन्दहास केवल देवी के मुख-सौन्दर्य का अलंकार नहीं है; वह अविद्या का नाश करके मन को जागृत करने वाला चेतन-प्रकाश बन जाता है। इस प्रकार शृङ्गार, भक्ति और आध्यात्मिक संकेतार्थ अत्यन्त सूक्ष्मता से एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।


यह स्तबक श्री गणपति मुनि की एक ही काव्यबिम्ब को अनेक रूपों में विकसित करने की क्षमता, अलंकारशास्त्रीय निपुणता, रूपक-रचना, मानवीकरण और शब्दचातुर्य का अद्भुत प्रदर्शन है। उमा देवी के मन्दहास जैसे एक ही भाव को लेकर उसे पुनरुक्ति का आभास दिए बिना पच्चीस अलग-अलग काव्यदृश्यों में विकसित करना उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। इस सूक्ष्म, स्वाभाविक और प्रवाहमयी भावाभिव्यक्ति के लिए आर्या छन्द अत्यन्त उपयुक्त प्रतीत होता है।


अन्तिम श्लोक में यह सम्पूर्ण काव्य एक दिव्य अर्पण में रूपान्तरित हो जाता है। मुनि की कल्पना में देवी के मन्दहास की मानो मुहर धारण किए हुए ये निर्मल आर्या श्लोक, अनुपम सौन्दर्यस्वरूपिणी उमा देवी की आराधना के लिए उनकी सन्निधि में पहुँचते हैं। इस प्रकार यह स्तबक सौन्दर्य से तत्त्व की ओर, मुस्कान से चेतन-प्रकाश की ओर और काव्य से उपासना की ओर सहज रूप से उन्नत होने वाला एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य स्तोत्र बन जाता है।


तृतीयं शतकम्

नवमः स्तबकः - आर्यावृत्तम्

मन्दहासः


शारदवलक्षपक्षक्षणदावैमल्यशिक्षकोऽस्माकम् ।

जागर्तु रक्षणाय स्थाणुपुरन्ध्रीमुखविकासः ।। २०१।।


व्याख्यानं हर्षस्य प्रत्याख्यानं शरत्सुधाभानोः ।

दिशतु हृदयप्रसादं गौरीवदनप्रसादो नः ।। २०२।।


अन्तर्गतस्य हर्षक्षीरसमुद्रस्य कश्चन तरङ्गः ।

हासो हरहरिणदृशो गतपङ्गं मम करोतु मनः ।। २०३॥


दिशि दिशि विसर्पदंशुप्रशमिततापं परास्तमालिन्यम् ।

कुशलानि प्रदिशतु नः पशुपतिहृदयेश्वरीहसितम् ।। २०४।।


अन्तर्गतं च तिमिरं हरन्ति विहसन्ति रोहिणीकान्तम् ।

हसितानि गिरिशसुदृशो मम प्रबोधाय कल्पन्ताम् ।। २०५।।


भूषातुषारदीधितिदीधित्या सह विहायसो रङ्गे ।

विचरन् पुरहरतरुणीदरहासो मे हरत्वेनः ।। २०६।।


रुद्राणीदरहसितान्यस्माकं संहरन्तु दुरितानि ।

येषामुदयो दिवसो भूषापीयूषकिरणस्य ।। २०७ ।।


स्कन्दजननीमुखेन्दोरस्मान् पुष्णातु सुस्मितज्योत्स्ना ।

मुनिमतिकैरविणीनामुल्लासकथा यदायत्ता ।। २०८।।


कमनीयकण्ठमालामुक्तामणितारकावयस्यो नः ।

कामान् वितरतु गौरीदरहासो नाम धवलांशुः ।। २०९।।


अनवद्यकण्ठमालामुक्तावलिकिरणनिवहसहवासी ।

हरदयितादरहासो हरतु ममाशेषमज्ञानम् ।। २१० ।।


ज्ञ इव ज्ञदृश्य उत्तम इलाधराधीशनन्दिनीहासः ।

पूर्णं करोतु मानसमभिलाषं सर्वमस्माकम् ।। २११ ।।


आलोकमात्रतो यः शङ्करमसमास्त्रकिङ्करं चक्रे ।

अल्पोऽप्यनल्पकर्मा हासो नः पातु स शिवायाः ।। २१२।।


स्मरमतरतमीशं यः करोति भावप्रसङ्गचातुर्या ।

द्विजगणपुरस्कृतोऽव्यात् स शिवाहासप्रवक्ता नः ।। २१३।।


रदवाससा रथी मां शरी करैः पातु पार्वतीहासः ।

पावकदृशं जिगीषोः पञ्चपृषत्कस्य सेनानीः ।। २१४ ।।


शिवहृदयमर्मभेदि स्मितं तदद्रीशवंशमुक्तायाः ।

दशनद्युतिद्विगुणितश्रीकं शोकं धुनोतु मम ।। २१५।।


ब्रह्माण्डरङ्गभाजो नट्याः शिवसूत्रधारसहचर्याः ।

श्रीवर्धनोऽनुलेपो मुखस्य हासः पुनात्वस्मान् ।। २१६ ।।


अधरप्रवालशयने नासाभरणप्रभाविलासिन्या ।

रममाणो हररमणीहासयुवा हरतु नः शोकम् ।। २१७।।


अधरोष्ठवेदिकायां नासाभरणांशुशाबकैः साकम् ।

कुलमखिलमवतु खेलन्नद्रिसुताहासबालो नः ।। २१८ ।।


अनुलेपनस्य वीप्सा द्विर्भावः कुचतटीदुकूलस्य ।

हरतु हृदयव्यथां मे हसितं हरजीवितेश्वर्याः ।। २१९।।


गिरिशाङ्गरागभसितं स्वागतवचसाऽभिनन्ददादरतः ।

गिरिजालीलाहसितं गरीयसीं मे तनोतु धियम् ।। २२० ।।


दयितेन सँल्लपन्त्याः सह तुहिनमरीचिशिशुकिरीटेन ।

वागमृतबुद्बुदोऽव्यादलसो मामगभुवो हासः ।। २२१ ।।


शुद्धः कुचाद्रिनिलयादपि मुक्ताहारतो हरपुरन्ध्र्याः ।

वदनश्रीप्रासादे विलसन् हासोऽलसोऽवतु माम् ।। २२२।।


व्यर्थीभूते चूते गतवति परिभूतिमसितजलजाते ।

अनिते सिद्धिमशोके कमलेऽपि गलज्जयश्रीके ।। २२३।।


बहुधा बिभेद हृदयं हरस्य बाणेन येन सुमबाणः ।

तदुमालीलाहसितं मल्लीसुममस्तु मे भूत्यै ।। २२४ ।।


अमलदरस्मितचिह्नास्ता एताः सर्वमङ्गला आर्याः ।

कमनीयतमास्वसमामुपतिष्ठन्तामुमां देवीम् ।। २२५।।

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